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Friday, July 10, 2015

सृजन की दीवार -

सृजन की दीवार

· माना जाता है कि विद्यालय की दीवार यानि‘बंदिश’ और बंदिशों में सृजन कहाँ हो सकता है ? सच मानिए विद्यालय की जिन दीवारों को बच्चे कैदखाने की दीवार समझते हैं, हम उन्हीं में से एक दीवार को सृजन की दीवार बना कर विद्यालय को कैदखाना समझने की उनकी सोच को बदल सकते हैं। बालमन हमेशा नया करने को आतुर होता है। हमारा बंधा बंधाया शिक्षा तंत्र उसकी इस प्रवृत्ति को संतुष्ट नहीं कर पाता है। ऐसे में हम अपनी कक्षा में कुछ ऐसा नवाचार करे जो बच्चों को इस नीरसता से सरसता की ओर ले चले।
    ऐसा ही एक नवाचार उत्तराखण्ड के शिक्षकों ने सामूहिक रूप से अभियान के रूप में किया। संचार के नए साधनों सेछोटी हुई इस दुनिया में मुझे इसकी जानकारी सोशियल मीडिया फेसबुक के माध्यम से हुई। पिछले कुछ दिनों से फेसबुक पर विचरण करते हुए ‘दीवार पत्रिका के अभियान’ से रूबरू हुआ। उत्तराखण्ड के रचनाशील शिक्षकों ने इसे अपनी स्वेच्छा से अपने विद्यालयों में चलाया और बकायदा सोशियल मीडिया के फेसबुक पेज,‘‘दीवार पत्रिका: एक अभियान’’ में आपस में शेयर भी किया जा रहा है। यह प्रयास सराहनीय है और शिक्षकों पर लगने वाले उन तमाम आरोपों को खारिज़ कर देता है कि शिक्षक कार्य नहीं करते। बहरहाल इससे भी इतर बात है कि यह समस्त कार्य स्वैच्छिक रूप से किया जा रहा है। स्वैच्छिक रूप से किए जाने वाले कार्यों में औपचारिकताओं के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। इस प्रकार के कार्यपूर्ण मनोयोग से सम्पन्न किए जाते है। इसी अभियान  से प्रेरित होकर बीकानेर के राजकीय माध्यमिक विद्यालय, लूणकरणसर के एक नवाचारी शिक्षक श्री मदन गोपाल लढ्ढा ने भी दीवार पत्रिका के कुछ अंक निकाले।
दरअसल यहाँ इस आलेख में इन बातों का उल्लेख मैं इसलिए कर रहा हूँ कि क्या हम अपने विद्यालयों में इस तरह के किसी कार्यक्रम को नियमित रूप से नहीं कर सकते ? इस संबंध में अध्ययन के बाद मैंने पाया कि दीवार पत्रिका शिक्षा में कोई नया प्रयोग नहीं है। यह पूर्व में भी भित्ती पत्रिका (वॉल मैगजीन) के रूप में नवाचारी और उत्साही शिक्षकों द्वारा उपयोग में लाया जाता रहा है। आज के सूचना के युग में हमारे विद्यार्थियों के पास सूचनाओं की कोई कमी नहीं है। वह बहुत कुछ जानता है। बहुत कुछ अभिव्यक्त करना चाहता है। लेकिन परीक्षाओं की जद्दोजहद में उलझ कर उसकी योग्यता परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण को रटने तथा परीक्षा में ज्यों का त्यों उतार देने में लग जाती है।  हमारे विद्यार्थी को मौलिक सोचने के अवसर कम ही प्राप्त होते हैं लेकिन यदि वह गलती से सोच भी ले तो उसको अभिव्यक्त करने के माध्यम उसे नहीं मिल पाता है। उसकी तमाम अभिव्यक्ति उसके दिल में ही दफन होकर रह जाती है। कुछ निजी और सरकारी विद्यालय अपनी सालाना स्मारिकाओं को माध्यम से विद्यार्थियों को ऐसा अवसर प्रदान करते है। यह कार्य खर्चीला और श्रम साध्य है, अतः प्रत्येक विद्यालय इसको कर पाने में सक्षम नहीं हो पाता। ऐसे में विद्यालय की एक दीवार को यदि हम अभिव्यक्ति का माध्यम बना दे तो बहुत ही कम खर्चें में हमारे कई उद्देश्य पूरे हो सकते है। इसकी सार्थक शुरूआत की जा सके इसलिए पहले दीवार पत्रिका और इसके प्रकाशन से होन वाले लाभों को समझना आवश्यक है । 

    दीवार या भित्ति पत्रिका क्या है-
   विद्यार्थियों द्वारा विद्यार्थियों के लिए बनाई गई हाथों से लिखी गई पत्रिका है। जिसका प्रकाशन विद्यालय की दीवार पर किया जाता है। इस पत्रिका में विद्यार्थियों के बनाए चित्र, रचनाएँ, चुटकलें, कविता, कहानी, अनुभव, विज्ञान से संबंधित जानकारियाँ, गणित से ंसंबंधित रोचक  जानकारियाँ तथा और भी बहुत कुछ को एक बड़े चार्ट पर चिपका कर विद्यालय की किसी दीवार पर टांग कर हस्तलिखित पत्रिका का प्रकाशन किया जा सकता है।
   दीवार या भित्ति पत्रिका निकालने से लाभ -
    ऽ    विद्यार्थियों में अध्ययन करने की आदत का  विकास होगा।  
    ऽ विद्यार्थियों की भाषा पर पकड़ और दक्षता में अभिवृद्धि होगी।    
   ऽ चूंकि यह कार्य विद्यार्थियों द्वारा ही किया जाना है इसलिए वे इसे बेहतर व उपयोगी बनाने के लिए प्रयास करेंगे जिससे शिक्षा का एक प्रमुख उद्देश्य स्वतंत्र चिंतन केे लिए प्रोत्साहित करना भी पूरा हो सकेगा।   
   ऽ विद्यालय में एक नियमित रूप से इस गतिविधि के संचालन से जब उनकी भाषायी दक्षता में वृद्धि होगी तो वे अन्य विषयों के अध्ययन में भी रुचि लेने लगेंगे।ऐसा करने से शिक्षा की गुणवत्ता में भी वृद्धि होगी। 
   ऽ विद्यार्थियों की सृजनशीलता और कल्पनाशीलता को मंच मिलने के कारण उन्हें प्रोत्साहन मिलेगा जिससे उनमें आत्मविश्वास का संचार होगा। जिससे वे अपने क्षेत्र में अधिक विश्वास के साथ कार्य कर सकेंगे।
    ऽ दीवार पत्रिका के माध्यम से ऐसा भी संभव है कि बच्चे के अपने मन की बहुत सी बातें जो विद्यार्थी हमसे शेयर नहीं कर पाते है, वे रचनाओं के माध्यम से कह दें और हमें अपने विद्यार्थियों अंतस में झांकने का अवसर मिलेगा।
(   लूणकरणसर के शिक्षक श्री मदन गोपाल लढ्ढा ने भी अपनी दीवार पत्रिका ‘‘कलरव’’ को निकालते वक्त ऐसा ही कुछ अनुभव किया था। उन्होंने एक केन्द्रीय साहित्य अकादमी से पुरूस्कृत स्थानीय युवा लेखक राजू राम बिजारणियां की किताब ‘‘चाल भतूळिया रेत रमा’’बच्चों को पढ़ने को दी और अपने पसंद कि कविता ढूंढ कर लिखने को कहा तो एक छात्र ने एक ऐसी कविता‘‘हिरोशिमा नागासाकी’’ चुनी जिसे देखकर कर लढ़ढा जी को लगा कि ये कविता उस के स्तर से कुछ ऊँची थी। जब उन्होंने उस बच्चे से बात कि तो ज्ञात हुआ कि वह बच्चा उस कविता के सच से गुजरा था। यानि वह कविता विस्थापितों केे दर्द को अभिव्यक्त करती थी। उस बच्चे का परिवार भी महाजन फायरिंग रेंज के कारण हुए विस्थापित गाँवों में रहता था। उसने इस विस्थापन के दर्द को महसुस किया हुआ था।)
सामूहिकता, जिम्मेदारी की भावना एवं दूसरे के विचारों को आदर करना जैसे सामाजिक गुणों का विकास भी दीवार पत्रिका के माध्यम से हो सकता है। 
दीवार पत्रिका के माध्यम उस क्षेत्र की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक गतिविधियों के बारे में वे अपनी जानकारी को पुख्ता कर पाने में समर्थ रहेंगे।विभिन्न प्रकार की बातों के अध्ययन से उनके सामान्य ज्ञान में वृद्धि होगी।
   ऽ इसके लगातार प्रकाशन से विद्यार्थियों की लेखन क्षमता भी विकसित होगी और वे सृजनात्मक लेखन करने में रुचि लेने लगेंगे।
   ऽ दीवान पत्रिका के प्रकाशन से जब उन्हें पुनर्वलन मिलेगा तो उनका संकोच समाप्त होगा और वे खुलकर आप के सामने अपनी बात रख सकेंगे तो कक्षा शिक्षण में अध्ययन - अध्यापन प्रक्रिया भी आनंददायी हो सकेगी। 
     ऽ इस दीवार पत्रिका का अध्ययन करने से उन्हें सद्साहित्य के अध्ययन के अवसर सरलता से प्राप्त होंगे जिससे उनमें नैतिकता जैसे सद्गुणों का विकास भी होगा।
यानि दीवार पत्रिका का प्रकाशन से जहाँ एक सहशैक्षिक गतिविधि का संचालन है वहीं दूसरी ओर इसके माध्यम से विद्यालय के वातावरण के आनंददायी और कलापूर्ण बनाया जा सकता है। इससे विद्यार्थियों की सृजन क्षमता में वृद्धि होगी तथा इसक अप्रत्यक्ष लाभ कक्षा शिक्षण मे उनके ज्ञान निर्माण की क्षमता में वृद्धि के रूप में देखने को मिलेगा।
    दीवार या भित्ति पत्रिका के लिए सामग्री कैसे आएगी
दीवार पत्रिका की समस्त सामग्री बच्चों द्वारा ही उपलब्ध करवाई जाएगी।शुरू -शुरू में इस पत्रिका के लिए सामग्री के लिए बच्चों की कक्षावार कार्यशालाएँ आयोजित की जाए और उन्हें इन कार्यशालाओं में विद्यालय के पुस्तकालय व वाचनालय में उपलब्ध बाल साहित्य अथवा आयु अनुसार साहित्य पढ़ने के लिए दिया जाए। ये कार्यशालाएँ भाषा के कालांश या अर्द्ध विराम के समय की जा सकती हैं। जब बच्चे बहुत कुछ पढ़ेंगे तो उनकी कल्पना शक्ति को विस्तार मिलेगा और वे बहुत कुछ लिख भी पाएँगे। सही भी है बहुत कुछ पढ़ने का बाद ही कुछ लिखा जा सकता है। कक्षा शिक्षण के दौरान विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बच्चों की लेखन कला को प्रोत्साहित किया जा सकता है। जैसे चित्र देख कर कहानी बनाओ, किसी फिल्म, धारावाहिक या नाटक की कहानी लिखने को कहना, पहेलियाँ बनवाना, स्थिति देकर सामाचार लिखवाना,  किसी घटना की रिर्पोटिंग करवाना, अपने प्रिय वस्तु पर लिखना, अपने जीवन की विचित्र घटना जैसे जब मैं डर गया था, जब मैं सबसे ज्यादा हंसा, जब बदमाशी करने पर मुझे सजा मिली जैसे रोचक विषयों और उनके निजि जीवन में घटित विषयों पर लिखने का अभ्यास करवाया जाए। इसके अलावा विभिन्न लेखकों की कहानियों को सुनाना, उन पर चर्चा करना। यहाँ एक बात और कि यदि उनसे उनके आसपास के लेखकों की किताबें पढ़ने को दी जाएँ तो वे उसे ज्यादा अपनेपन से पढ़कर समझने का प्रयास करेंगे। अपने आसपास के प्रसिद्ध व्यक्तियों के साक्षात्कार लेना। किसी बाग, बगीचे, खेत, खलिहान, रेल्वे स्टेशन, बस स्टैण्ड का भ्रमण कर उसकी वृतांत लिखना। यदि किसी विद्यार्थी ने कहीं भी यात्रा की हो तो उसका वृतांत लिखने के लिए प्रेरित करना आदि गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों की अभिरुचि जागृत की जा सकती है। ध्यान रहे ये समस्त गतिविधियाँ हमारे पाठ्यक्रम से भी संबंधित हैं। इसलिए कक्षा शिक्षण के दौरान भी भाषा के कालांश में इस प्रकार का प्रशिक्षण आसानी से दिया जा सकता है।
   दीवार या भित्ति पत्रिका कैसे निकाले
           इतने प्रशिक्षण के बाद आप के पास पहले ही अंक के लिए बहुत सी सामग्री आ सकती है। चूंकि इस दीवार पत्रिका का समस्त कार्य विद्यार्थियों के द्वारा ही किया जाना है। अतः कक्षावार लगाए गई कार्यशालाओं के माध्यम से आपको यह ज्ञात हो जाएगा कि कौन - कौन से विद्यार्थी इस कार्य में अधिक रुचि ले रहे हैं। इन रुचिशील विद्यार्थियों को एकत्र करउन्हीं में से संपादक मंडल का गठन किया जाय। ध्यान रहे इस सम्पूर्ण कार्य में आपकी भूमिका मात्र मार्गदर्शक की ही रहेगी।  इस संपादक मंडल में कुछ ऐसे बच्चे लिए जा सकते जिनकी वर्तनी की अशुद्धियाँ कम होती हों, कुछ ऐसे बच्चे भी लिए जा सकते हैं जो अच्छे चित्र बना सकते हों, कुछ बच्चे जो चार्ट निर्माण करने में रुचि लेने वाले हो। इस प्रकार अलग अलग क्षमताओं के बच्चों का एक संपादक मंडल बनाया जा सकता है। संपादक मंडल को कैसे काम करना है इसके लिए आधी छुट्टी के समय उनके साथ एक या दो दिन कार्यशाला के रूप में काम करें। ताकि वे इसकी अवधारणा को समझ सके तथा दूसरे बच्चों को भी इस कार्य के लिए प्रोत्साहित करें। इसके पश्चात इसी संपादक मंडल को इसका कोई नाम रखने के लिए कहे। जैसे राजकीय माध्यमिक विद्यालय, लूणकरणसर की भित्ती पत्रिका का नाम ‘कलरव’ है। नाम के पश्चात इसकी समयावधि तय की जाए जो कि साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक या अनियतकालीन हो सकती है। इसके पश्चात संपादक मंडल अपने पहले अंक के सभी बच्चों से उनकी रचनाओं या संकलित रचनाओं यथा - कहानी, कविता, चुटकले, नाटक, रिपोर्ट, विज्ञान संबंधी जानकारी, गणित के चमत्कारिक अनुभव या अच्छे चित्र इत्यादि को निर्धारित तिथि तक संपादक मडंल द्वारा आमंत्रित की जाए। तत्पश्चात विद्यार्थियों का संपादक मंडल ही दीवार पत्रिका में उपलब्ध स्थान के आधार पर रचनाओं का चयन करें। उन रचनाओं में वर्तनी अशुद्धि की जांच कर पुनःलेखन करे अथवा रचनाकार से ही करवाएं तो ज्यादा बेहतर हो। संपादक मंडल अपना संपादकीय भी तैयार करे। इन सभी को अपनी सूझबूझ से चार्ट पर चिपकाएं। उसे सुन्दर बनाने के आप संपादक मंडल को प्रेरित करें। इसकी मजबूती को बनाए रखने के लिए इसके उपर लेमिनेशन किया जा सकता है। इस चार्ट के किनारों को मजबूत टेप से ढक दे ताकि यह फटे नहीं। यह दीवार पर इकठ्ठा नहीं हो इसके लिए इसके उपर व नीचे गत्ते या लकड़ी को टेप की सहायता से लगाए। तत्पश्चात निर्धारित तिथि को इसे दीवार पर
टांग दिया जाए। इस संबंध में आप संपादक मंडल को बदल कर काम लें तो  बहुत से विद्यार्थियों को यह अवसर मिल सकता है। दीवार पत्रिका के विद्यालय में मनाए जाने वाले उत्सवों के अनुसार विशेषांक निकाल सकते हैं। आप इस पत्रिका में स्थायी कॉलम भी जैसे विज्ञान की बात, गणित के रोचक किस्से, संस्कृत श्लोक, अनमोल वचन, आदि भी रख सकते हैं। एक बात ओर ध्यान रखने की है कि कहीं ऐसा न हो कुछ पांच सात विद्यार्थी ही हर अंक में अपनी रचनाएँ देते रहें और बाकी सब विद्यार्थी उन्हें देखते रहें। इसलिए आवश्यक है कि आप सभी को प्रेरित करें। एक बात यह भी कि दीवार पत्रिका दीवार पर लगी है और कोई उसे पढ़े ही नहीं। इसलिए आप कक्षा शिक्षण के दौरान पत्रिका में प्रकाशित अंशों पर चर्चा कर सकते हैं। 
        इस प्रकार बड़े ही सस्ते में हम विद्यालय की दीवार को ‘सृजन की दीवार’ बना सकते है। बस आवश्यकता मन में कुछ करने के जज़्बे की है। लेकिन यहाँ पर आपको कुछ करना नहीं है। कुछ करना है तो मात्र इतना ही कि बच्चों का मार्गदर्शन और कुछ सुविधा जुटाने का कार्य करना है। सही मायने में सृजन की दीवार बनाने के लिए आपको अपनी सृजनशीलता बच्चों को प्रेरित करने में लगानी है। सभी काम उन्हीं को करने देना है। आप सुविधादाता और मार्गदर्शक की भूमिका में ही रहेंगे तभी सही मायने में बच्चों मंे सृजनशीलता का विकास हो सकेगा।
      प्रमोद कुमार चमोली






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