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Saturday, July 11, 2015

डॉ ए पी जे अब्दुल कलाम द्वारा शिक्षकों को दिए गए एक उद्बोधन का भावानुवाद -

मैं स्कूलों के प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों के साथ बातचीत करने तथा उन्हें संबोधित करने में स्वयं को खुश महसूस कर रहा हूँ। आप सभी को मेरा अभिवादन। मित्रों, मैं जब आज आप सभी के साथ यहाँ हूँ, तब मैं आपसे सच्चे, न्याय परायण एवं नेक युवाओं के विकास के विषय पर कुछ विचार साझा करना चाहता हूँ।
मैं अपनी बात कृष्णागिरि जिले के कैम्बिज पब्लिक ई-स्कूल, सवुलुर, कावेरीपत्तनम के 2 अक्टूबर 2013 को किये गए दौरे के एक दिलचस्प अनुभवों से वर्णन से शुरू करता हूँ। यह स्कूल अपने परिसर में 10,000 वर्ग फुट के एक 'आदर्श खेत (मॉडल फार्म)' पर जैविक खेती कार्यान्वित कर रहा है तथा बच्चों को सब्जियों से लेकर धान तक की विभिन्न फसलों की खेती करने के साथ-साथ सिंचाई की तकनीक और खरपतवार को हटाने के बारे में भी सिखाता है। स्कूल के प्रतिनिधि श्री सनत कुमार ने मुझे स्पष्ट किया कि बिना कृषि पृष्ठभूमि के ही विद्यार्थियों ने उत्साह के साथ तकनीक को सीखने में खुद को शामिल किया है। उनके कुछ छात्र स्कूल के समय के बाद अपने घर के पिछवाड़े में कृषि कर रहे हैं। मैं एक स्कूल में कृषि जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में इस प्रकार के कौशल विकास को देखकर खुश हुआ। 
अब मैं एक शिक्षक की भूमिका पर मेरी धारणा को आपसे साझा करता हूँ।

शिक्षक की भूमिका-

यद्यपि मेरे स्कूल में अध्ययन करने के कई साल बीत चुके हैं, फिर भी मैं अपने जीवन के विभिन्न चरणों के कई अवसरों पर अपने शिक्षकों को उनके द्वारा मेरे जीवन को एक दृष्टि देने, उनके शिक्षण के अनूठे तरीकों तथा इस सबसे ऊपर उनके द्वारा नैतिक तंत्र के एक रोल मॉडल के रूप में व्यवहार करने के लिए याद करता हूँ। मैंने पिछले दो दशकों के दौरान पूरे देश में 21 लाख से अधिक स्कूली बच्चों तथा हजारों शिक्षकों के साथ बातचीत की है। मैं जहाँ भी गया, चाहे यह अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु हो या भारत का कोई अन्य हिस्सा हो, अपनी दृष्टि और स्वप्नों को अभिव्यक्त करने में वहाँ के युवाओं की आवाज अद्वितीय और दृढ है तथा वे इनके लिए कार्य करने को तैयार हैं। प्रत्येक व्यक्ति का एक समृद्ध भारत, एक सुखद भारत, एक शांतिपूर्ण भारत और एक सुरक्षित भारत में रहने का सपना है। एक राष्ट्र के लिए समृद्धि, खुशी और शांति का संयोजन सदैव एक साथ ही आना चाहिए हैं। जब उक्त तीनों का अभिसरण होगा, तभी तो भारत वास्तव में एक आर्थिक रूप से विकसित देश होगा। भारत में 400 मिलियन से अधिक बच्चे हैं। जब मैं प्रधानाध्यापकों और शिक्षकों की इस सभा को संबोधित कर रहा हूँ, तो मुझे लगता है कि मैं भारत के भविष्य के लिए आधार तैयार करने वाले शिक्षण समुदाय के एक विशिष्ट 'काट-क्षेत्र' (क्रॉस सेक्शन) के साथ बातचीत कर रहा हूँ। मेरा विश्वास है कि शिक्षक एक मोमबत्ती बनकर विद्यार्थियों के मस्तिष्क रूपी दूसरी मोमबत्ती की ज्योति प्रज्ज्वलित कर सकते हैं। बच्चे अपनी 12 साल की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के दौरान लगभग 25000 घंटे विद्यालय में कार्य करते हैं। शिक्षक अपने उत्कृष्ट शिक्षण और मूल्यवान जीवन के उदाहरण प्रस्तुत करके विद्यार्थियों के लिए एक रोल मॉडल बन सकते हैं। मैं स्कूल द्वारा बच्चों में निर्मित की जा सकने वाली क्षमताओं पर चर्चा करूँगा।
मैं आपको क्या दे सकता हूँ
हममें से हर एक अपने बचपन से व्यावसायिक जीवन में आने तक शिक्षा के विभिन्न चरणों से गुजरता है। मैं एक दृश्य की कल्पना करता हूँ - जिसमें एक बच्चा, एक किशोर, एक वयस्क और एक नेतृत्व प्रदान करने वाला व्यक्ति है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष परिस्थिति में कैसे प्रतिक्रिया करता है? अगर यह परिस्थिति "मानवीय आवश्यकता" है। बच्चा पूछता है "आप मुझे क्या दे सकते हैं"? किशोरवय का बालक कहता है "मुझे अकेला छोड़ दो, मैं इसे अकेले ही करना चाहता हूँ" अनुभवी व्यक्ति कहता है "आईए, हम सब मिलकर करते हैं"। एक लीडर प्रस्ताव देता है कि "मैं आपको क्या दे सकता हूँ"। अतः प्रधानाचार्य और अध्यापकों के ऊपर एक बच्चे को "तुम मुझे क्या दे सकते हो" की स्थिति से एक लीडर के रूप में "मैं आपको क्या दे सकता हूँ" की स्थिति तक रूपांतरित करने की एक जबरदस्त जिम्मेदारी है। यह एक प्रधानाचार्य और शिक्षक को एक प्रेरक नेतृत्व क्षमता के साथ दूरदर्शी होने की मांग करता है। इसके अलावा प्रधानाचार्य को ये सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षक का शिक्षण इस प्रकार का होना चाहिए कि वे बच्चों में से सर्वश्रेष्ठ को बाहर ला सकें और इसके लिए उन्हें एक महान शिक्षक होना होगा। मुझे यकीन है कि प्रधानाचार्यों, शिक्षकों और अभिभावकों के एकीकृत प्रभाव से स्कूलों में 'सर्वोत्कृष्ट रचनात्मक वातावरण' उभरेगा। 

कैसे हम समयबद्ध रूप से "रोजगार कौशल बल (Force)" उत्पन्न कर सकते हैं-

मित्रों, मुझे अब शिक्षा एवं कौशल का विस्तृत अर्थ करने दीजिये। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत को अगले एक दशक के समय में 300 से 500 मिलियन रोजगार कुशल युवाओं की आवश्यकता होगी। इसलिए हमें हमारे विश्वविद्यालय शिक्षा और माध्यमिक विद्यालयीन शिक्षा के पाठ्यक्रम को पूरी तरह से बदलने की आवश्यकता है। माध्यमिक विद्यालयीन पाठ्यक्रम में 9 वीं, 10 वीं, 11 वीं, 12 वीं कक्षा के समय के 25 प्रतिशत समय को कौशल विकास कार्यक्रम के लिए आवंटित करना होगा। ऐसा करने पर जब विद्यार्थी माध्यमिक शिक्षा पूर्ण कर विद्यालय से बाहर आयेंगे तब दो प्रमाण पत्र दिए जाएंगे; जिनमे से एक 10+2 के योग्यता के लिए और दूसरा चार साल की अवधि के दौरान अर्जित अद्वितीय कौशल के लिए। इसका मतलब है कि हमें प्रतिवर्ष लाखों कुशल बच्चों एक संग्रह मिलेगा। ऐसी स्थिति में, शिक्षाविदों द्वारा निभाई गई भूमिका अद्वितीय होगी जो बालक में कौशल उन्नयन  करके उसे ज्ञान समाज का सदस्य बनाने में मदद कर सकेंगे। हम यह कैसे ऐसा कर सकते हैं? मुझे सुझाव दें।

मोबाइल कौशल विकास केंद्र -

दिल्ली में 900 से अधिक सरकारी स्कूल हैं। मेरा अनुमान है कि इनमे से प्रत्येक स्कूल में 300-400 बच्चों को तैयार किया जा सकता है। बेशक, विभिन्न बाधाओं के कारण प्रत्येक विद्यालय को "कौशल विकास प्रयोगशाला" से लैस नहीं किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में क्या संभव समाधान हो सकता है?
एक समाधान यह हो सकता है कि छात्रों को पूरे शैक्षणिक कैलेंडर में प्रति सप्ताह 1-2 कालांश के लिए निकट के 'कौशल विकास और प्रशिक्षण केंद्र' में ले जाया जाए तथा वहां उन्हें लघु प्रशिक्षण दिया जाए। ये केन्द्र आईटीआई या पॉलिटेक्निक या निजी कार्यशालाएं और इलेक्ट्रॉनिक प्रयोगशालाएं हो सकते हैं।
एक अन्य तरीका "मोबाइल कौशल विकास प्रयोगशालाओं" की शुरुआत हो सकती है। इन मोबाइल वैन को विद्यालयी बच्चों के लिए कौशल विकास और व्यावसायिक वर्ग संचालन करने के लिए आवश्यक उपकरणों और हार्डवेयर से लैस किया जाए तथा इन्हें समयबद्ध रूप से विशेष क्षेत्र के एक स्कूल से दूसरी स्कूल तक स्थानांतरित कर सकते हैं। प्रशिक्षण के लिए प्रत्येक वैन में प्रशिक्षकों के साथ आईसीटी सामग्री, यांत्रिक और केमिकल इंजीनियरिंग का सेटअप करना होगा। वैन को पूर्व निर्धारित शेड्यूल दिया जा सकता तथा स्कूल के साथ समन्वय के लिए मोबाइल संचार के माध्यम से विद्यालयों के प्रिंसिपलों के साथ संपर्क स्थापित किया जा सकता है। इस प्रकार की एक वैन एक दिन में 2 स्कूलों को कवर कर सकती हैं, वे आसानी से नियमित रूप से 12 स्कूलों के लिए कक्षाओं का संचालन कर सकती है।
स्कूलों के सहयोग से सरकार द्वारा एक ऐसी प्रणाली को कार्यान्वित किया जाता है, तो हम हमारे युवाओं को स्कूल स्तर से ही कौशलवान बनाने के मिशन का क्रियान्वयन कर सकते हैं और अगले 3-4 साल के भीतर शिक्षा की स्थिति में काफी सुधार कर सकते हैं। इसके अलावा शिक्षाविदों द्वारा विभिन्न कौशलों और सामान्य जीवन में उनके महत्व का परिचय देने और बालकों को इस दिशा में प्रेरित करने के लिए प्री स्कूल एवं प्राथमिक स्कूलों की अध्ययन सामग्री की समीक्षा करनी चाहिए।

ब्रह्मांड के कौतुक-

दोस्तो, हमें ध्यान में रखना चाहिए कि मानव मन एक अनूठा उपहार है। आप 'ब्रह्मांड के कौतुक या चमत्कारों' में तभी प्रवेश कर सकते हैं जब आप में जिज्ञासा एवं चिंतन है। स्कूलों का मिशन कक्षा में जिज्ञासा एवं चिंतन का सृजन करना है और शिक्षकों का कार्य विद्यार्थियों को प्रश्न दर प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित करना तथा उनका धैर्य से जवाब देना है। मेरा सुझाव है कि आपके जीवन में क्या उतार-चढाव आ रहे हैं, इसकी परवाह किये बगैर चिंतन आपकी पूंजी बननी चाहिए। चिंतन प्रगति है। अचिंतन व्यक्ति, संगठन और देश के लिए एक ठहराव है। चिंतन 'क्रिया' करने के लिए प्रवृत्त करता है। क्रिया के बिना ज्ञान बेकार और अप्रासंगिक है। क्रिया सहित ज्ञान समृद्धि लाता है।
एक प्रधानाचार्य के रूप में, आपको युवा मन को मानव जीवन के हर पहलू का पता लगाने के लिए उर्वरित करना है। आकाश की ओर देखो। हम अकेले नहीं हैं। पूरा ब्रह्मांड हमारे लिए मित्रवत है और जो सपना देखते हैं तथा जो इसे पूरा करने के लिए क्रियावान है, उनको सर्वश्रेष्ठ देने के लिए प्रेरित करता है। सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर ने इस जिज्ञासा के माध्यम से ब्लैक होल की खोज कीकि क्यों अधिकतर तारें चमकते हैं एवं कुछ तारें क्यों मर जाते हैं। "चंद्रशेखर-सीमा" का उपयोग करके आज हम कितने समय तक की गणना कर सकते हैं कि सूरज कितने वर्षों तक चमकता रहेगा।
जैसे कि सर सीवी रमन ने समुद्र और आकाश की ओर देखा तथा प्रश्न किया कि समुद्र व आकाश नीले रंग के क्यों होते हैं? इसने उन्हें "रमन प्रभाव" के जन्म के लिए उद्यत किया। उन्होंने पाया कि 'समुद्र का नीला दिखाई देना', प्रकाश के आणविक प्रकीर्णन के कारण होता है तथा यह पानी में आकाश की परछाई का मामला नहीं था जैसा कि अधिकतर व्यक्तियों की कल्पना थी। जैसे कि, अल्बर्ट आइंस्टीन ने ब्रह्मांड की जटिलता को महसूस करते हुए प्रश्न किया कि ब्रह्मांड का जन्म कैसे हुआ। प्रसिद्ध समीकरण E = mc2 प्राप्त हुआ, जिससे विखंडनीय सामग्री का उपयोग कर बिजली का निर्माण किया जा सकता है एवं इसी ने परमाणु अस्त्रों की ओर अग्रसर किया। भारत में 1960 के दौरान एक महत्वपूर्ण घटना हुई, प्रो विक्रम साराभाई ने देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक दृष्टि प्रदान की। उन्होंने कहा कि भारत को स्वयं की रॉकेट प्रणाली का निर्माण करना चाहिए, संचार और सुदूरसंवेदी उपग्रहों का निर्माण करना चाहिए तथा इन्हें एकीकृत करके भारतीय अंतरिक्ष प्रक्षेपण केंद्रों से प्रक्षेपित करना चाहिए और इन्हें भू-समकालिक कक्षा एवं सूर्य समकालिक कक्षा में स्थापित किया जाना चाहिए। आज भारत किसी भी प्रकार की रॉकेट प्रणाली एवं उपग्रह का निर्माण कर सकता है, उसे एक निर्दिष्ट कक्षा में प्रक्षेपित कर सकता है तथा कई ग्रहों तक पहुँचने की क्षमता रखता है। लाखों लोग इस ब्रह्मांड में चलते हैं। लेकिन पिछली शताब्दी में एक महान आत्मा ने भारत भूमि की यात्रा की और अहिंसा धर्म का प्रयोग करते हुए भारत को स्वतंत्रता की ओर अग्रसर किया। मेरे प्यारे दोस्तों, आप छात्रों को महात्मा गांधी या सर सीवी रमन या आइंस्टीन या सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर या विक्रम साराभाई के रूप में बड़ा सपना देखने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। आप अपने ब्रह्मांड के कौतुकों को देखें। आप छात्रों में से महान विचारकों को निर्मित कर सकते हैं और वे रचनाकार बन सकते हैं।

मूल्य शिक्षा -

मैं अपने कॉलेज के दिनों के सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिरापल्ली के एक जेसुइट संस्थान के सर्वोच्च प्राधिकारी रेव फादर रेक्टर कलाथिल के द्वारा दिए गए व्याख्यान याद करता हूँ। वह हर सोमवार एक घंटे के लिए एक क्लास लेते थे। वह वर्तमान और अतीत के अच्छे मनुष्यों तथा किसी व्यक्ति को कौनसे गुण अच्छा मनुष्य बनाते हैं, के बारे में बात करते थे। वह कक्षा में बुद्ध, कन्फ्यूशियस, सेंट अगस्टीन, खलीफा उमर, महात्मा गांधी, आइंस्टीन, अब्राहम लिंकन जैसे व्यक्तित्वों और हमारी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी नैतिक कहानियों पर व्याख्यान देते थे। नैतिक विज्ञान की कक्षा में, फादर कलाथिल अपने व्याख्यान में उन पहलुओं को उजागर करते थे कि कैसे माता पिता की देखभाल, शिक्षण और महान पुस्तकों के साहचर्य के माध्यम से वे अच्छे मनुष्य के रूप में विकसित हुए। यद्यपि मुझे वे व्याख्यान 1950 में मेरे कॉलेज के दिनों के दौरान दिए गए थे, किन्तु वे आज भी मुझे प्रेरित करते हैं। यह आवश्यक है कि स्कूलों और कॉलेजों में महान शिक्षकों द्वारा सप्ताह में एक बार एक घंटे के लिए हमारी सभ्यता की विरासत और मूल्य प्रणाली पर व्याख्यान दिए जाएँ। इन व्याख्यानों को 'नैतिक विज्ञान की कक्षा' कहा जा सकता है, जो युवा मन को देश व अन्य इंसानों से प्रेम करने तथा अपनी उच्च योजनाओं की दिशा में कार्य करने हेतु उन्नत करें। यह प्रत्येक नागरिक के आचरण में अक्षय अच्छाई के साथ नैतिकता के गठन को सुनिश्चित करेगा। प्राथमिक, माध्यमिक और कॉलेज की शिक्षा के मेरे शिक्षकों ने अपने शिक्षण से मुझे कुछ दशक आगे रखा था। यह वास्तव में उनकी एक दृष्टि थी।

नैतिक नेतृत्व -

21 वीं सदी के लिए स्कूलों को किस तरह का  नेतृत्व विकसित करने की आवश्यकता है? हमारे 21 वीं सदी की चुनौती का सामना करने के लिए स्कूलों और शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों को आज नैतिक नेतृत्व का व्यवहार करना चाहिए। उन्हें स्कूलों और स्कूली शिक्षा के लिए एक नई दृष्टि का विकास करना होगा, एक ऐसे शैक्षिक वातावरण के निर्माण की दृष्टि जिसमें छात्र अधिक स्वायत्त ढंग से सीखने की प्रक्रिया के माध्यम से विकसित हो सकें। हमें स्वायत्तता के बारें में केवल छात्रों को व्याख्यान नहीं देना हैं। हमें स्वायत्तता को स्कूलों में सीखने की कला के रूप में एक प्रक्रिया के माध्यम से विकसित और अधिग्रहित किया जाना चाहिए। आप सभी प्रधानाचार्यों और शिक्षकों के माध्यम से छात्रों को एक ऐसी शिक्षा उपलब्ध करायी जानी है जो राष्ट्र को ऐसे प्रतिबद्ध नेता प्रदान करें जो राष्ट्र को एक समृद्ध, शांतिपूर्ण, सुरक्षित और खुशहाल  भारत को बदल सके।
मित्रों, मैंने शिक्षकों के लिए एक बारह बिंदु की शपथ तैयार की है जिसे आप सब लोग ग्रहण करें-

शिक्षकों के लिए शपथ

1. सबसे पहले, मैं शिक्षण से प्रेम करूँगा/करूंगी। शिक्षण मेरी आत्मा होगी।
2. मैं महसूस करता/करती हूँ कि मैं न सिर्फ छात्रों को अपितु प्रज्वलित युवाओं को आकार देने के लिए जिम्मेदार हूँ,  जो पृथ्वी के नीचे, पृथ्वी पर और पृथ्वी के ऊपर सबसे शक्तिशाली संसाधन हैं। मैं शिक्षण के महान मिशन के लिए सम्पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध हो जाऊंगा/जाऊंगी।
3. मैं स्वयं को एक महान शिक्षक बनाने के लिए विचार करूंगा/करूंगी,जिससे मैं अपने विशिष्ट शिक्षण के माध्यम से औसत स्तर के बालक का उत्थान सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए कर सकता/सकती हूँ।
4. विद्यार्थियों के साथ मेरा कार्य-व्यवहार एक माँ, बहन, पिता या भाई की तरह दयावान और स्नेहपूर्ण रहेगा।
5. मैं अपने जीवन को इस प्रकार से संगठित एवं व्यवहृत करूँगा/करूँगी कि मेरा जीवन स्वयं ही मेरे विद्यार्थियों के लिए एक संदेश बने।
6. मैं अपने विद्यार्थियों को प्रश्न पूछने तथा उनमें जिज्ञासा की भावना को विकसित करने को प्रोत्साहित करूंगा/करूँगी, ताकि वे रचनात्मक प्रबुद्ध नागरिक के रूप में विकसित हो सके।
7. मैं सभी विद्यार्थियों से एकसमान व्यवहार करूंगा/करूँगी तथा धर्म, समुदाय या भाषा के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का समर्थन नहीं करूंगा/करूँगी।
 8. मैं लगातार अपने शिक्षण में क्षमता का निर्माण करूँगा/करूँगी ताकि मैं अपने छात्रों को उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान कर सकूं।
9. मैं अत्यंत आनन्द के साथ अपने छात्रों की सफलता का जश्न मनाऊँगा/मनाऊँगी।
10. एक शिक्षक होने के नाते मैं अहसास करता/करती हूँ कि राष्ट्रीय विकास के लिए की जा रही सभी पहल में मैं एक महत्वपूर्ण योगदान कर रहा/रही हूँ।
11. मैं लगातार मेरे मन को महान विचारों से भरने तथा चिंतन व कार्य व्यवहार में सौम्यता का प्रसार करने का प्रयास करूँगा/करूँगी।
12. हमारा राष्ट्रीय ध्वज मेरे ह्रदय में फहराता है तथा मैं अपने देश के लिए यश लाऊँगा/लाऊँगी।

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