Total Pageviews

Monday, April 20, 2015

कुछ ऐसा किया जाए ..............

मित्रो यदि आप नेट पर सक्रिय है तो आपने दीवार पत्रिका के बारे में अवश्य ही पढ़ा होगा | हालाँकि मुझे इस दीवार पत्रिका को भित्ति पत्रिका कहने में भी कोई ऐतराज नहीं है | एक प्रश्न ये है की क्या राजस्थान के विद्यालयों में हम शिक्षको के द्वारा विद्यार्थियो की रचनात्मकता को बढ़ावा  देने के लिए ऐसा या अन्य किसी तरह के कार्यक्रम को शिददत के साथ लागु किया जाना चाहिए ? दीवार पत्रिका का ये  अभियान किस तरीके से चला और हम इसे किस तरीके से चला सकते हैं ,उसे आपके सामने महेश पुनेठा जी के आलेख के  माध्यम से रखता हूँ |  (लेखक मंच से साभार)

‘दीवार पत्रिका’ को एक अभियान बनाए जाने की आवश्यकता है : महेश पुनेठा

school magazine
बच्चों की रचनाशीलता को मंच देने और उसे प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से हमने पिछले कुछ समय से ‘दीवार पत्रिका’ के प्रकाशन का कार्य प्रारम्भ किया है। यह विद्यालय के विद्यार्थियों के द्वारा किया जाने वाला पाक्षिक आयोजन है। इस पत्रिका को जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है विद्यालय की दीवार में लगाया जाता है। इसमें बच्चों द्वारा तैयार की गई कहानी, कविता, लेख, संस्मरण, चुटकलों, पहेलियों, समाचार, वर्ग पहेली, सामान्य ज्ञान संबंधी तथ्य, चित्र, कार्टून आदि को एक कागज में सुलेख में लिखकर एक लंबे आदमकद चार्ट में चिपकाया जाता है। इस पत्रिका के संपादन को कार्य पूरी तरह बच्चों द्वारा किया जाता है। बच्चों का एक संपादक मंडल बनाया गया है जो विधावार विषय सामग्री का संकलन और चयन करता है। इस काम को सहज-सरल बनाने के लिए बच्चों को पढ़ने के लिए देश भर से निकलने वाली विभिन्न बाल पत्रिकाएं दी जाती हैं ताकि वे नए अनुभव ग्रहण कर उन्हें अपने तरीके से अपनी दीवार पत्रिका को तैयार करने में उपयोग कर सकें। बच्चे बहुत रुचि से पत्रिका पढ़ते हैं क्योकि उनका पढ़ना सोद्देश्य हो जाता है। उन पत्रिकाओं से भी अपनी दीवार पत्रिका के लिए उपयोगी सामग्री लेते हैं। पत्रिका में एक दूसरे को सहयोग करते हैं। अपने साथियों को लिखने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। विद्यालय के बच्चों को दीवार पत्रिका की प्रतीक्षा रहती है। धीरे-धीरे यह स्थिति आने लगी है कि इस दीवार पत्रिका में छपने के लिए बच्चों में उत्सुकता बढ़ने लगी है। बच्चे पत्रिका में प्रकाशित सामग्री को पढ़कर अपनी प्रतिक्रिया देने लगे हैं। साहित्य की विभिन्न विधाओं और पत्रकारिता की बारीकियों को जानने-समझने लगे हैं।

दीवार पत्रिका : एक अभियान फेसबुक पेज से साभार 
इस दीवार पत्रिका को प्रारम्भ करते हुए कुछ कठिनाइयाँ अवश्य आयीं। बार-बार कहने पर भी बच्चों ने कोई खास रुचि नहीं दिखाई। बच्चों के लिए यह एकदम नया विचार था। बच्चों को  स्वयं रचना तैयार करना बहुत कठिन काम लगता था। परंतु उन्हें निरंतर प्रोत्साहित किया जाता रहा। उनसे बातचीत जारी रखी गई। उन्हें पढ़ने के लिए बाल साहित्य दिया गया। उसके महत्व से उन्हें अवगत कराया गया। एक-दो अंक तैयार कर उनके सामने प्रस्तुत किए गए। हिंदी शिक्षण के दौरान ही उन्हें अपने विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए प्रोत्साहित किया गया। छोटी-छोटी कविताएं, कहानियाँ, निबंध, लेख, यात्रा वृतांत, जीवन-प्रसंग आदि तैयार करवाए गए। समय-समय पर विद्यालय में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों और आसपास की घटनाओं की रिपोर्टिंग करवाई गई। उनमें से बेहतर रचनाओं को दीवार पत्रिका में लगाया जाने लगा। इसके लिए मासिक परीक्षाओं तक का भी उपयोग किया गया। हिंदी की परीक्षा में बच्चों को ऐसे विषयों पर लिखने के लिए कहा गया जिसमें बच्चे अपने अनुभव से बहुत कुछ लिख सकते हैं। जैसे- एक बार कक्षा नौ के बच्चों से कहा गया कि अपने जीवन के किसी ऐसे प्रसंग को लिखें ‘जब उन्हें बहुत खुशी हुई या रोना आया हो’। बच्चों ने बेहद रोचक प्रसंग लिखे। इन प्रसंगों से न केवल बच्चों की भाषायी दक्षता का ही पता चला बल्कि बच्चे के भीतर झाँकने का अवसर भी मिला। यह भी जानने को मिला कि बच्चे अपने आसपास को कैसे देखते हैं ? अपने बड़ों के प्रति क्या सोचते हैं? उन्हें जीवन में कौन-सी घटना प्रसन्नता देती है और कौनसी दुःख पहुँचाती है? आदि….आदि। इसमें एक सबसे रोचक तथ्य जो सामने आया कि जो बच्चे आमतौर से कक्षा में दो-चार पंक्तियाँ भी नहीं लिख पाते थे उन्होंने दो-दो, तीन-तीन पृष्ठों में अपने संस्मरण लिख डाले। बच्चों द्वारा लिखे गए इन संस्मरणों को भी दीवार पत्रिका में स्थान दिया गया। इस घटना से हमारा भी विश्वास बढ़ा कि यदि बच्चों को अवसर प्रदान किए जाएं तो वे बहुत कुछ कर सकते हैं। आवश्यकता है उनकी अभिव्यक्ति को सम्मान और अवसर प्रदान करने की।

दीवार पत्रिका : एक अभियान फेसबुक पेज से साभार 
इसकी शुरुआत में एक बात और हुई। दीवार पत्रिका तो बनने लगी परंतु उसमें गिने-चुने दो-चार बच्चों की ही भागीदारी होती थी। यह सामूहिक प्रयास न होकर व्यक्तिगत जैसा ही अधिक बना रहा। कुछ बच्चे इसको समय की बर्बादी तथा फालतू का काम समझते थे। इस पर विचार कर निर्णय लिया गया कि इसके लिए बच्चों का एक समूह तैयार किया जाए। इस उद्देश्य से 6 से 12 तक की प्रत्येक कक्षा से ऐसे बच्चों का चयन किया गया जो अपनी कक्षा में सबसे बेहतर माने जाते हैं। जो पढ़ने-लिखने में अधिक रुचि रखते हैं। उसमें कुछ ऐसे बच्चों को भी चुना गया जिनका हस्तलेख बहुत सुंदर है या चित्रकला में अच्छा दखल है। पूरे विद्यालय के लगभग 30-35 बच्चों का ऐसा एक समूह गठित किया गया जिसे ‘बाल बौद्धिक प्रकोष्ठ’ नाम दिया गया। इनकी बैठकें आयोजित की गईं जिसका संचालन बच्चों द्वारा ही किया गया। इस समूह के बच्चों ने आपस में बातचीत कर आम सहमति और रुचि के अनुकूल दीवार पत्रिका के लिए दस सदस्यीय संपादक मंडल का चयन किया। आपस में भूमिकाओं का वितरण किया गया। अब सामगी संकलन-चयन से लेकर चार्ट में चिपका कर उसे पत्रिका का स्वरूप प्रदान करने की सारी जिम्मेदारी यही संपादक मंडल करता है। बाल बौद्धिक प्रकोष्ठ की भूमिका केवल दीवार पत्रिका तैयार करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इस समूह के बच्चे जब कभी भी उन्हें अवकाश मिलता है आपस में बैठकर अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। अपनी समस्याओं को एक-दूसरे के साथ बाँटते हैं । भविष्य के लिए रणनीति बनाते हैं। आपस में पढ़ने-लिखने के कार्यो में एक-दूसरे की मदद करते हैं। अपनी समस्याओं के समाधान के लिए अध्यापकों से मिलते हैं। इनकी योजना में है कि भविष्य में विद्यालय में साहित्यिक व बौद्धिक क्षमताओं के विकास के लिए समय-समय पर विभिन्न गतिविधियों का आयोजन किया जाए, जैसे- भाषण, निबंध, वाद-विवाद, कविता, कहानी, चित्रकला, सामान्य-ज्ञान प्रतियोगिता, बाल रचनात्मक कार्यशाला, गोष्ठी आदि। इसके प्रकोष्ठ का लक्ष्य है कि विद्यालय तथा अपने गाँव-पड़ोस का वातावरण शैक्षिक तथा रचनात्मक बनाया जाए। इस तरह से यह प्रकोष्ठ विद्यालय में एक संदर्भ समूह के रूप में काम करता है।
दीवार पत्रिका : एक अभियान फेसबुक पेज से साभार 
जैसा कि बच्चों में रचनात्मक लेखक के विकास के लिए विभिन्न विद्यालयों में विद्यालय पत्रिका का प्रकाशन किया जाता है जो एक अच्छा प्रयास है पर हमारा मानना है कि उसकी कुछ सीमाएं हैं। अधिक खर्चीली होने के कारण उसका वर्ष में एक से अधिक अंक निकालना संभव नहीं है। जहाँ छात्र संख्या कम है वहाँ एक बार निकाल पाना भी संभव नहीं हो पाता। इसमें संपादन से लेकर प्रकाशन में बच्चों की अपेक्षा अध्यापकों की सक्रियता और भागीदारी ही अधिक रहती है जिससे बच्चों को बहुत अधिक कुछ कर पाने तथा सीखने का अवसर नहीं मिल पाता है। लिखने का अवसर भी वर्ष में एक ही बार मिल पाता है। अतः लेखन कौशल के विकास एवं बच्चों की अभिव्यक्ति को मंच प्रदान करने की दृष्टि से इसे बहुत उपयोगी नहीं कहा जा सकता है। विद्यालय पत्रिका के साथ-साथ निरंतर दीवार पत्रिका भी निकाली जाए तो इससे दोनों का महत्व बढ़ जाएगा। विद्यालय पत्रिका के लिए स्तरीय एवं मौलिक सामग्री भी मिल पाएगी। वास्तव में विद्यालय पत्रिका निकालने का उद्देश्य भी पूरा हो पाएगा।
दीवार पत्रिका : एक अभियान फेसबुक पेज से साभार 
यहाँ पर मैं यह भी बताना चाहूँगा कि दीवार पत्रिका का यह अभिनव प्रयोग केवल राजकीय इंटर कॉलेज, देवलथल में ही नहीं पिथौरागढ़ जनपद के एक दूरस्थ विद्यालय क.पू.मा.वि., नाचनी में रचनात्मक शिक्षक मंडल के राज्य सचिव राजीव जोशी द्वारा भी किया जा रहा है। उन्होंने इस प्रयोग को प्रारंभ करने से पूर्व एक पाँच दिवसीय रचनात्मक बाल कार्यशाला का आयोजन किया जिसमें बच्चों को दीवार पत्रिका को तैयार करने के बारे में आवश्यक जानकारी देने के साथ ही बच्चों में लेखन कौशल को बढ़ाने के उद्देश्य से रोचक गतिविधियाँ करवाई गईं। यह प्रसन्नता की बात है कि वहाँ भी यह प्रयोग सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहा है । बच्चे उत्तरोत्तर बेहतर करते जा रहे हैं।
हमारा मानना है कि इस प्रयोग को हर विद्यालय में शुरू किया जाना चाहिए क्योंकि यह न केवल बच्चों की भाषायी दक्षता, अध्ययन की प्रवृत्ति और सृजनशीलता बढ़ाने में सहायक है बल्कि विद्यालयों में अनुशासन की समस्या को सुलझाने में भी एक हद तक मददगार है। रचनात्मक शिक्षक मंडल के सदस्यों को इसे एक अभियान की तरह लेना चाहिए। इससे प्राप्त अनुभवों को रचनात्मक शिक्षक मंडल के आगामी सम्मेलनों में आपस में बाँटा जाना चाहिए ताकि इसको अधिक उपयोगी और प्रभावकारी बनाया जा सके।

लेखक मंच से साभार

आप इस लेख को इस लिंक पर भी देख सकते है -

Lekhakmanch

No comments:

Post a Comment