Total Pageviews

Friday, December 26, 2014

*♥*अमेरिका की अंतरिक्ष एजेन्सी नासा ने स्वीकार किया सूर्य को अर्ध्य देने के गुण*♥*

क्या आप एक से अधिक स्थानों पर एक ही समय पर रहना चाहते हैं? क्या आप घटनाओं को होने से पहले उनका अनुमान लगा लेने की टेलीपेथी का गुण प्राप्त करना चाहते हैं तो सूर्य को रोज प्रातः अर्ध्य दीजिए। अमेरिका की अंतरिक्ष एजेन्सी नासा ने सूर्य को अर्ध्य देने की क्रिया के इन लाभ को स्वीकार किया है। अमेरिकी समाचार पत्र The Guardian Express में प्रकाशित एक लेख में इस बात को बताया गया है। इसमें स्वीकार किया है कि सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के समय सूर्य को कुछ समय तक देखने से "सुपर मानव" के ये गुण आम इंसान में भी आ सकते हैं। वैसे तो भारतीय मनीषियों ने सूर्य को अर्ध्य देने की प्रक्रिया की महत्ता शास्त्रों में स्थापित की है किंतु अब इसे वैज्ञानिक भी स्वीकार करने लगे हैं। वर्तमान में यह क्रिया महज धार्मिक रूप ले चुकी है तथा ज्योतिषियों ने इसे रूढ़ि का रूप देकर "सूर्य ग्रह" के दोषों के निवारण का उपाय मात्र बना कर रख दिया है। यह क्रिया प्राचीन काल में न केवल भारत में प्रचलित थी अपितु मिस्र, माया, तिब्बत आदि सभ्यताओं में भी इसे उपयोग में लिया जाता रहा है। The Guardian Express के लेख में इस क्रिया को 'सन ग्रेजिंग या सन ईटिंग' (Sun Grazing or Sun Eating) की संज्ञा दी गई है। इसमें बताया गया है कि हीरा रतन मानक नामक एक व्यक्ति ने नासा के समक्ष स्वयं को प्रस्तुत किया तथा यह कह कर अपना वैज्ञानिक परीक्षण करने के लिए कहा कि वह केवल सूर्य की ऊर्जा से अपना गुजारा चला सकते है तथा उसे भोजन की आवश्यकता भी नहीं है। नासा ने पेनिसिनवेलिया विश्वविद्यालय के मेडिकल डॉक्टरों की टीम को उस व्यक्ति की 100 दिनों तक चौबीसों घंटे निगरानी रखने के नियुक्त किया। उन्होंने पाया कि वह व्यक्ति प्रातःकालीन सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का सेवन करके ही अपना अधिकांश गुजारा कर लेता है, बस कभी कभार कुछ बटर मिल्क और पानी का सेवन करता है। यूक्रेन के निकोलाई डोल्गोरूकी नामक व्यक्ति ने भी खुद को सन ईटर घोषित करते हुए गार्जीयन एक्सप्रेस को बताया कि वो पिछले 12 वर्षों से सूर्य की ऊर्जा प्राप्त कर रहे है तथा मात्र इसी से अपना अधिकांश गुजारा कर रहे है।

कैसे करनी चाहिए यह क्रिया-

गार्जीयन के मुताबिक इस क्रिया को करने में विशेष सावधानी की आवश्यकता है। इसमें कुछ कठोर नियमों का पालन करना चाहिए अन्यथा हानि हो सकती है। इसमें सूर्य को सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के समय ही देखना चाहिए क्योंकि इस समय सूर्य के प्रकाश में पराबैंगनी किरणों की मात्रा न्यूनतम होती है। इस समय नंगे पाँव रहना चाहिए तथा पाँव पृथ्वी के संपर्क में रहने चाहिए। इस क्रिया को प्रारंभ में 10 सेकंड तक तथा धीरे-धीरे इसके समय में वृद्धि की जानी चाहिए। सूर्य चढ़ने के बाद तो इसे हर्गिज नहीं करना चाहिए। सूर्य को अर्ध्य देने की भारतीय परंपरा में भी इसी प्रकार की सावधानियों को बताया गया है। सूर्य अर्ध्य की क्रिया में तो पानी की धारा के बीच से सूर्य के दर्शन की बात की जाती है।

कैसे होता है इसका शरीर पर प्रभाव-

इस तकनीक का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों के अनुसार प्रारंभ के 3 महीने तक सूर्य की ऊर्जा आँखों के माध्यम से मस्तिष्क के हाइपोथेलेमस ट्रेक्ट को चार्ज करती है। इस ऊर्जा से सर्वप्रथम मस्तिष्क को तनाव तथा चिंता से राहत मिलती है। व्यक्ति में आत्मविश्वास तथा समस्या हल करने की क्षमता बढ़ती है। सारी नकारात्मकता समाप्त होती है तथा शरीर में सकारात्मक अभिवृत्ति भर जाती है। व्यक्ति में क्रोध, भय तथा ईर्ष्या समाप्त हो जाती है। अधिक महीनों तक इस क्रिया को करने से शरीर को रोगों से मुक्ति मिलती है तथा भोजन की आवश्यकता भी समाप्त हो जाती है।

गार्जीयन का पूरा आलेख यहाँ पढ़े-
http://guardianlv.com/2013/05/nasa-confirms-super-human-abilities-gained/

1 comment:

  1. सुंदरतम ब्लॉग सुंदरतम प्रस्तुति और जानकारी .................................................................

    ReplyDelete