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Saturday, December 20, 2014

प्राथमिक कक्षाओं में पर्यावरण अध्ययन

प्राथमिक कक्षाओं में पर्यावरण अध्ययन: जीवन जीने की पद्धति


पर्यावरण अध्ययन क्या हैः-

सामान्यतः पर्यावरण अध्ययन को परिस्थितिकी विज्ञान से जोड़कर देखा जाता है। मान लिया जाता है। इसे प्राकृतिक जगत की घटनाओं को समझने व उसके प्रति सरोकारो से जुड़ी पर्यावरण शिक्षा मान लिया जाता है। यह सही है कि कोई भी व्यक्ति अपने आस-पास से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। हमारे आस-पास का समस्त भौतिक, जैविक और सामाजिक वातावरण हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमें प्रभावित करता है। यही सभी कारक मिलकर हमारा परिवेश बनाते हैं। हम अपने परिवेश को जानते हैं, समझते है और उसमें अन्तःक्रिया करते हैं। इन्हीं सभी बातों को यदि हम पढ़ने-पढ़ाने के अर्थों में ले तो यही पर्यावरण अध्ययन का सरल रूप  हो सकता है। सरल शब्दों में कहें तो अपने आस-पास की छानबीन, जाँच-पड़ताल ही पर्यावरण अध्ययन है या यूँ कहें कि अपने परिवेश को जानना समझना ही पर्यावरण अध्ययन है। 

यहाँ पर जिस पर्यावरण अध्ययन की हम चर्चा करना चाहते हैं वह प्राथमिक कक्षाओं का विषय है। जो पिछले कुछ दशकों से ही प्रचलन में आया है। पर्यावरण अध्ययन कई मायनों में पर्यावरण शिक्षा से भिन्न है। प्राथमिक कक्षाओं में विषय के रूप में पर्यावरण अध्ययन द्वारा बच्चें में आसपास के यानि उसके प्राकृतिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक वातावरण के प्रति बनी समझ को परिमार्जित कर पुख्ता किया जाता है। जिससे वह अधिक सजग बन सके।

प्राथमिक स्तर पर पर्यावरण अध्ययन की स्थिति:-

हमारी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखाएँ इस बात को ध्यान में रखकर बनाई गई कि पर्यावरण की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। हमारी विभिन्न पाठ्यचर्याओं में इस बात की सिफारिशे की गई। राष्ट्रीय पाठयचर्या की रूपरेखा ने 1975 के अपने नीति पत्र में प्राथमिक कक्षाओं में पर्यावरण अध्ययन को एक अलग विषय के रूप में पढ़ाने की सिफारिश की थी। इसमें यह प्रस्तावित किया गया था कि पर्यावरण अध्ययन में कक्षा 1 व 2 में इसमें प्राकृतिक और सामाजिक पर्यावरण को सम्मिलित रूप से पढ़ाया जाना चाहिए तथा कक्षा 3 से 5 तक इसे पर्यावरण भाग-1 तथा पर्यावरण भाग-2 के रूप में क्रमशः सामाजिक अध्ययन और विज्ञान पृथक -पृथक विषय के रूप में पढ़ाया जाने चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 तथा राष्ट्रीय पाठयचर्या की रूपरेखा 1988 में भी पर्यावरण अध्ययन के बारे में उपयुक्त व्यवस्था को ही मंजूर किया गया था। राष्ट्रीय पाठयचर्या की रूपरेखा 2000 में पहली बार पर्यावरण अध्ययन को सामाजिक अध्ययन और विज्ञान के रूप में पृथक-पृथक न कर समेकित रूप में पढ़ाने की सिफारिश की गई थी। इसके अनुसार कक्षा 3 से 5 के स्तर पर बच्चों को ‘पर्यावरण उसके प्राकृतिक और सामाजिक रूप  में विभक्त न करते हुए एक सम्पूर्ण विषय के रूप में पढ़ाने के लिए कहा गया। कक्षा 1 व 2 में इसे पाठ्यक्रम के अलग से विषय के रूप में नहीं रख कर इसकी पाठ्यसामग्री को बच्चे के निकटतम पर्यावरण से लिया जा कर इसे भाषा और गणित विषयों के साथ एकीकृत कर पढ़ाने के लिए कहा गया। 
राष्ट्रीय पाठयचर्या की रूपरेखा 2005 में भी प्राथमिक कक्षाओं में पर्यावरण अध्ययन को समेकित पद्धति से अधिक सशक्त रूप से पढ़ाने पर बल दिया गया। कक्षा 1 व 2 में स्तर पर पर्यावरणीय कौशलों  एवं सरोकारों को भाषा तथा गणित के विषयों के साथ एकीकृत रूप  में पढ़ाने की सिफारिश की गई है तथा कक्षा 3 से 5 तक अलग विषय के रूप में पढाए जाने की संस्तुति की गई है।  

पर्यावरण अध्ययन का स्वरूपः-

गंभीरता से विचार कर के देखें तो ‘पर्यावरण अध्ययन’ मात्र विषय नहीं अपितु यह जीवन जीने की पद्धति है। इसके माध्यम से भावी जीवन की तैयारी हेतु कौशलों का विकास किया जाता है। अतः यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि पर्यावरण अध्ययन की विषयवस्तु कैसी हो तथा किस तरह से जीवन जीने की पद्धति सहजता से बच्चों मे पोषित कर सके यानि वह अपने सामाजिक, सांस्कृतिक, जैविक और भौतिक वातावरण के साथ तादात्मय स्थापित करते हुए उसके साथ संवेदनशील ढंग से अपनी समझ का निर्माण कर सके। हमारे परिवेश में भौतिक घटक (हवा, पानी, मिट्टी, धूप, वर्षा), जैविक घटक (मनुष्य, जीव-जंतु, पेड़ पौधे) तथा सामाजिक घटक (रिश्ते-नाते,समाज, रीति-रिवाज, परम्ंपराएँ) में अन्तःक्रियाएँ चलती रहती हैं। इन्हीं अन्तःक्रियाओं के प्रति समझ भावी जीवन की तैयारी है। अतः पर्यावरण अध्ययन की विषय-वस्तु ऐसी हो जो इस प्रकार की समझ विकसित करती हो । पर्यावरण अध्ययन की विषय वस्तु में जहाँ एक ओर हम प्रकृति के विभिन्न घटकों के प्रति समझ बनाने वालेे तत्वों को शामिल कर सकते है वहीं दूसरी ओर उसके चारों और के समाजिक पर्यावरण की समझ बनाने वाले तत्वों को सम्मिलित किया जा सकता है।
अगर विषय के रूप में हम देखे तो हमारे परिवेश के इन  दो घटकों - प्राकृतिक एवं सामाजिक का अध्ययन क्रमशः विज्ञान एवं सामाजिक विज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। अपने परिवेश की समझ को ओर पुख्ता बनाने हेतु इतिहास और भूगोल की समझ की जरूरत से इन्कार नहीं किया जा सकता। अपने आसपास के प्रति समझ बनाने के लिए सौन्दर्यात्मक अनुभूति के महत्व को नकारा नहीं जा सकता। अतः कला शिक्षा का अघ्ययन भी समचीनी लगता है। साथ ही स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण साधन की अनदेखी कर बच्चों से अपने आसपास के प्रति समझ बनाने की अपेक्षा करना बेमानी सा लगता इसलिए स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा विषय का अध्ययन भी करवाना होगा। ऐसे में इतने विषयों का अलग अलग अध्ययन प्राथमिक कक्षाओं में करवाना हो तो बच्चे का बस्ता बच्चे से भारी होना लाजमी सा लगता है। 
मोटे रूप में देखें तो पर्यावरण अध्ययन का उद्देश्य बच्चे में उन क्षमताओं को विकसित करना है जिससे वह अपने आस-पास के समस्त भौतिक, और जैविक परिवेश के प्रति अपनी समझ को विकसित कर सके। वह अपने आस- पास के सामाजिक वातावरण को समझ सके। अपने परिवेश की सामाजिक ,सांस्कृतिक विभिन्नताओं और जटिलताओं को समझ सके। पर्यावरण के प्रति जागरूक हो सके। इन सभी अमूर्त से लगने वाले उद्देश्य की प्राप्ति के लिए बच्चों मे अवलोकन करना, संकलन करना, वर्गीकरण करना, प्रयोग करना, मापन करना, अनुमान लगाना, चर्चा करना, चिंतन करना, और निष्कर्ष निकालना, जैसी क्षमताओं को विकसित करने जैसे मूर्त उद्देश्य लिए जा सकते है। 
पर्यावरण अध्ययन के ये उद्देश्य व उनसे जुड़े सरोकार, देखने में बड़े ही सरल से प्रतीत होते हैं परन्तु वास्तविकता में ये इतने सरल नहीं है। ऐसा करने के लिए अधिगम को एकीकृत परिपेक्ष्य में लिया जाना आवश्यक हो जाता है। ऐसा तब ही संभव हो सकता है जब घटक विषय एकीकृत रूप में हो। यानि पर्यावरण के अध्ययन के पाठ्यक्रम का विकास इस रूप में हो कि इसमे सम्मिलित सभी विषय शिक्षा के बालकेन्द्रित स्वरूप  की रक्षा करते हुए ऐसे सांझे स्वरूप में इस प्रकार रखें जिसमें विभिन्न संकल्पनाओं और कौशलों के मध्य अंत और अंतर सम्बन्ध हों। सरल शब्दों में कहें तो घटक विषयों का सीमरहित समेकन हो। 

पर्यावरण अध्ययन सीमा रहित समेकन की आवश्यकता:-

सामान्यतः किसी भी विषय का पाठ्यक्रम बनाने के लिए उस विषय के विशेषज्ञों के साथ चर्चा करके बनाया जा सकता है। लेकिन पर्यावरण अध्ययन विषय का पाठ्यक्रम बनाने के लिए इसके अलग - अलग घटक विषयों के विशेषज्ञों से चर्चा करनी होगी। जो उस विषय की मूल स्वरूप की रक्षा के  आग्रह से रूढिगत होंगे। ऐसे में  इन विषयों को समेकित कर पाठ्यक्रम बनाने को कहा जाए तो क्या होगा ? पाठ्यक्रम इन घटक विषयों के पाठों की सूची से अधिक कुछ भी नहीं होगा। जिसमे हर विषय अपने अनुशासन और अपनी पद्धति के साथ खड़ा रहेगा। अलग-अलग विषय ,उनके अलग-अलग अनुशासन और इन सभी विषयों के प्रति समझ बनाने के लिए अलग-अलग प्रकार की क्षमताओं के विकास की आवश्यकता है। इस स्थिति पर चिंतन करें तो पर्यावरण अध्ययन ऐसे विषय के रूप में उभरता है। जिसमें विभिन्न विषयों से संबंधित असम्बद्ध जानकारियाँ भरी हो। क्या ऐसा करना विद्यार्थी के साथ न्याय करना होगा? ऐसी स्थिति में वह अपने आस-पास के विषय में कैसी समझ बना पाएगा? यह शिक्षाविदो  के लिए हमेशा चिंता का विषय रहा है। 
ऐसा माना जाता है कि बच्चा टुकड़े - टुकड़े में खंडित बातों की बजाय संपूर्णता में बातों के प्रति अपनी समझ को आसानी से बना पाता है। वह चीजों को संपूर्णता में देखता है। उदाहरण के रूप में देखे तो बच्चा पेड़ को एक संपूर्ण पेड़ के रूप में पहचानता है। वह पेड़ को घर का पेड़ या बाहर का पेड़ के रूप में पहचान करता है। उसके लिए पेड़ का उतना ही अर्थ है जितना वह अपने आसपास देखता है। वह देखता है पेड़ पर पक्षी बैठते है। गिलहरी उछल कूद करती है। पीपल के पेड़ की लोग पूजा करते है। यानि इस अवस्था में वह मूर्त बातों को ही देखता है। यदि यहीं पर उसे पेड़ के बारे में वैज्ञानिक जानकारी देना शुरू करदे और कहें कि पेड़ से ऑक्सीजन प्राप्त होती है। पेड़ों की पत्तियाँ अलग - अलग प्रकार की होती है। पेड़ हमारे लिए भोजन प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया द्वारा बनाते है। अमुक स्थान पर अमुक प्रकार की वनस्पति पाई जाती है जैसी अमूर्त और अनुभव से परे की बातंे बताने लगते है तो बच्चा इन्हें अपने अनुभवों से जोड़ नहीं पाता है। उसके पास इन बातों को मात्र सूचनाओं के रूप में रट लेने अलावा और कोई उपाय नहीं बचता है। ऐसे में अलग-अलग विषयों के अनुशासन और क्षमताओं से भरा पर्यावरण अध्ययन हो तो शिक्षक और विद्यार्थी दोनो ही सूचनाओं को रटने - रटाने के उपक्रम में लगे रहेंगे। परिणाम विषय के मूल उद्देश्य से भटकाव और विद्यार्थी अपने पर्यावरण के प्रति सार्थक समझ विकसित नहीं कर पाएँगे। अतः पर्यावरण अध्ययन विषय ऐसा होना चाहिए जो कि उपर्युक्त परिस्थितियों को हतोत्साहित करे। ऐसा करने के लिए आवश्यक है कि इसमें घटक विषयों को सीमारहित समेकन हो। तभी हम पर्यावरण अध्ययन के उद्देष्य की प्राप्ती कर सकते है।
एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा कक्षा 3 से 5 तक पर्यावरण अध्ययन के पाठ्यक्रम को एकीकृत स्वरूप प्रदान करने के लिए छः विषय क्षेत्रों परिवार और मित्र (संबंध, कार्य, एवं खेल, जानवर, पौधे) , भोजन, आवास, जल, यात्रा, और कुछ करना व बनाना की पहचान की गई जिनमें बहुविषयकता को एकीकृत रूप में  साथ साथ रखा जा सकता है। इन्हें ही थीम कहा गया है। यहाँ ‘थीम’  के साधारण अर्थो में समझे तो यह एक विशेष प्रकार के माहौल का जिसमें सभी कुछ एक जैसा सा हो का अहसास देती है। पाठ्यक्रम में यह कमोबेश अपने उसी अर्थ को चरितार्थ करते हुए विषयों को एक जैसा सा यानि एकीकृत स्वरूप में रखते हुए सीखने और सिखाने का एक नया तरीके के रूप में ध्वनित होती है। 

राजस्थान के परिपेक्ष्य में पर्यावरण अध्ययन विषय का पाठ्यक्रमः-

राजस्थान के परिपेक्ष्य में देखें वर्तमान में चल रहे इस पाठयक्रम में प्राथमिक कक्षाओं के लिए कक्षा 1 से 3  तक पर्यावरण अध्ययन को एकीकृत विषय के रूप  में पढ़ाया जाता था।  कक्षा 4 व 5 में पर्यावरण अध्ययन भाग-1 (विज्ञान) व पर्यावरण अध्ययन भाग-2 (सामाजिक) के रूप में अध्ययन करवाया जा रहा था। ंराष्ट्रीय पाठयचर्या की रूपरेखा 2005 के परिपेक्ष्य में राजस्थान में पर्यावरण अध्ययन का नया पाठ्यक्रम बनाया गया। यह पाठ्यक्रम  पर्यावरण अध्ययन की समेकित पद्धति को अधिक सशक्त रूप ध्यान रख कर बनाया गया है। राजस्थान का यह पाठ्यक्रम पर्यावरण अध्ययन विषय को एकीकृत रूप में रखता है। 
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा- 2005 के अनुरूप राजस्थान में पर्यावरण अध्ययन के नवीन पाठ्यक्रम में कक्षा 1 से 2 तक इसे अलग विषय के रूप में नहीं रख कर भाषा और गणित के साथ जोड़ा गया है। कक्षा 3 से 5 तक अलग विषय के रूप में विकसित किया गया है।
राजस्थान के पाठय्क्रम पर गौर करें तो यह इस सीमारहित समेकन की कसौटी पर खरा उतरता है। इस बार का पर्यावरण अध्ययन का पाठय्क्रम मात्र अध्यायों की सूची नहीं है वरन् यह थीम आधारित है। राजस्थान का यह पाठ्यक्रम एन.सी.एफ. 2005 के नीति निर्देशक सिद्धान्तों यथा - ज्ञान को विद्यालय के बाहरी जीवन से जोड़ना, पढ़ाई रटन्त प्रणाली से मुक्ती, पाठयचर्या पाठय पुस्तक केन्द्रित ना होकर बच्चों को चहुँमुखी विकास के अवसर मुहैया करवाए, परीक्षा को लचीला बनाना और कक्षा की गतिविधियों से जोड़ना तथा एक ऐसी अधिभावी पहचान का विकास जिसमें प्रजातांत्रिक राज्य व्यवस्था के अंतर्गत राष्ट्रीय चिंताएँ समहित हों को व्यापक रूप से समाहित करते हुए विकसित किया गया है। 
इन सभी बातों को समाहित करते हुए एन.सी.ईं.आर.टी. के पर्यावरण अध्ययन के पाठ्यक्रम की भांति थीम आधारित बनाया गया। इसमें भी छः थीम परिवार, मित्र और आस-पास का वातावरण , भोजन, आवास, जल, यात्रा, और कुछ करना व बनाना रखी गई हैं। कक्षा 3 से 5 तक इन थीमों को तक सीखने के मूलभूत सिद्धांतो सरल से कठिन व मूर्त से अमूर्त ध्यान में रखते हुए कक्षा के स्तर के अनुसार बढ़ते हुए क्रम में विकसित किया गया। राजस्थान का पर्यावरण अध्ययन का यह नवीन पाठ्यक्रम कई मायनों में नवाचार से युक्त है। नवाचार अपनाते हुए इसे एक भिन्न प्रारूप में विकसित किया गया है। पाठयक्रम बनाने की मुख्य संप्रत्ययों को देने की परम्परागत लीक को तोडते हुए ‘जिज्ञासा’ से शुरू किया गया है। इस जिज्ञासा के माध्यम से बच्चों के मन में उठने वाले प्रश्नों की कल्पना की गई है। इन प्रश्नों को देने का उद्देश्य बच्चों की सोच को थीम के अनुरूप नई दिशा की ओर ले जाने के लिए उत्प्रेरित करना है जिससे वे जो पढ़े वह उनके आस-पास का लगे यानि ज्ञान को उसके जीवन से जोड़ा जा सके। वह जो पढ़ रहा है उसे अपना सा लगे। साथ ही विविधता से भरे हमारे प्रदेश की तमाम सांस्कृतिक और सामाजिक विभिन्नताओं का समावेश आसानी से हो सके। वे अपने क्षेत्र अपनी संस्कृति को समझते हुए अपनी समझ को विकसित करें और स्वयं एक सार्थक ज्ञान का सृजन करने की दिशा में आगे बढ सकें। इस पाठ्यक्रम में एक और नवाचार करते हुए संभावित संसाधन और संभावित गतिविधियों को भी दिया गया है। यह शिक्षको के लिए कक्षा कक्ष को ज्ञान निर्माण का केन्द्र बनाने में सहायक होगी।

राजस्थान का पर्यावरण अध्ययन की नवीन पाठ्यपुस्तकेः-

राजस्थान में एस.आई.ई.आर.टी द्वारा प्राथमिक कक्षाओं के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या - 2005 के अनुरूप पाठ्यक्रम का निर्माण कर उसी के अनुरूप पाठ्यपुस्तकों को विकसित करवाया गया है। इसी क्रम में कक्षा 1 व 2 में चूंकि यह अलग से विषय के रूप मेें नहीं है अतः इसकी अलग से पाठ्यपुस्तकों का निर्माण नहीं किया गया है। कक्षा 1 व 2 में इस विषय की विषयवस्तु को भाषा और गणित में समावेशित किया गया है। कक्षा 3 से 5 तक की पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यपुस्तकों का अलग से विकास भी किया गया है। ‘मेरी दुनिया’ शीर्षक से बनी ये पुस्तकें कक्षा 3 व 5 में 2013 से तथा कक्षा 4 में 2014 के सत्र से लागु कर दी गई है। 
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या -2005 के आलोक में बनी ये पुस्तकें सुन्दर साज - सज्जा लिए है। ये पुस्तकें इस उद्देश्य को आधार बना कर लिखी गई हैं कि शिक्षा का उद्देश्य जानकारी हस्तान्तरण नहीं है, इसका उद्देश्य  विद्यार्थी में उन क्षमताओं को विकसित करना है जो जानकारी एकत्र करने, ज्ञान के सृजन और उसके व्यावहारिक उपयोग को सम्भव बनाती हैं।
  इनका आकर्षक कवर सहज ही लुभाता है। प्रत्येक पाठ का लेआउट भी इस तरह डिजाईन किया गया है कि उसके चित्र उस थीम को प्रदर्शित करें और विद्यार्थी उसे सहज ही पढ़ने को लालायित हो। पाठ्यक्रम के अनुरूप बनी इन पुस्तकों में यह प्रयास किया गया है कि ये सचमुच बच्चे को उसकी दुनिया लगे। 
ये पुस्तकें कई मायनों में पूर्व की पुस्तकों से अलग है। अलग होना स्वभाविक ही है क्यों की प्रथम बार ही पर्यावरण अध्ययन हेतु थीमेटिक एप्रोच पर काम किया गया है। इन पुस्तकों को यह बात ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है कि पर्यावरण जैसे विषय के लिए पुस्तक ही मात्र ज्ञान की संवाहक नहीं है। इस विषय के लिए ज्ञान निर्माण के अवसर कक्षा - कक्ष की बजाय बच्चें के आस-पास के पर्यावरण में बहुतायत से हैं। विभिन्नताओं से भरे राज्य के हर विद्यार्थी की दुनिया सामाजिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से बहुत अलग है ऐसे में सभी कुछ समाहित किया जाना लगभग असंभव सा होता है। लेकिन ये पुस्तकें इसे तोड़ती हुई नजर आती है। ये बच्चे के आस - पास की दुनिया का हवाला चाहे अनचाहे बच्चे से ही लेने का प्रयास करती है।  ये पुस्तकें बच्चों के प्रक्रियात्मक और रचनात्मक विकास को प्रोत्साहित करने वाली है। 
ये पुस्तकें इस धारणा को प्रतिपुष्ट करती है कि बच्चा ‘खाली पन्ना’ नहीं है, जिसमें हम चाहें जो लिख दें। दरअसल ये पुस्तकें मानती है कि विद्यालय में आने वाला विद्यार्थी अपनी दुनिया से नाना प्रकार के अनुभवों को संजोए हुए अपना स्वयं का ज्ञान लेकर आता है। नए ज्ञान के निर्माण के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि पुराने अनुभवों को सहभागी बनाकर आगे बढा जाए। इसलिए इस पुस्तक में देखो और चर्चा करो, सोचो और लिखो, चर्चा करो और लिखो, पता करो और चर्चा करो जैसी गतिविधियों को पर्याप्त स्थान दिया गया। इन सभी साधारण सी लगने वाली गतिविधियों के अर्थ कक्षा - कक्ष को ज्ञान निर्माण को केन्द्र बनाने में अत्यन्त प्रभावी हो सकते हैं। 
ये पाठ्यपुस्तकें एक तरफा शिक्षा प्रणाली यानि शिक्षक ज्ञान के अभिदाता के रूप में विद्यार्थी मात्र श्रोता रूप में ज्ञान अभिग्राही बनने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने के व्यवस्था देती है। ये कक्षा कक्ष को गतिविधियों से भरे एक उत्साहपूर्ण माहौल देने की कोशिश करती है। जरूरत इस बात की है कि हम कक्षा कक्ष में इसका प्रयोग किस प्रकार करते हैं ? यदि इस पुस्तक का प्रयोग पुरानी परंपराओ व रूढियों के अनुसार किया जाता है  तो ये बच्चों की दुनिया न रह कर हमारी दुनिया बन जाएगी। 

पर्यावरण अध्ययन के परिपेक्ष्य में शिक्षक की भूमिका:-

शिक्षा के क्षेत्र में नित नए नवाचारों से शिक्षण प्रक्रिया को सरल और रुचिकर बनाने के प्रयास होते रहते है परन्तु ये प्रयास सार्थक तभी होते हैं, जब हम शिक्षक इसे खुले दिल से अपनाते है। पर्यावरण अध्ययन के लिए शिक्षक साथियों को इस जटिल विषय की अधिगम प्रक्रिया के प्रति अपनी समझ को नए आयाम देनें होंगे। सबसे पहले इस धारणा से उबरना होगा कि बच्चा एक खाली बर्तन या कोरी स्लेट है। वह विद्यालय में आने से पूर्व वह अपने पर्यावरण से प्राप्त अनुभवों से अपना ज्ञान प्राप्त बनाता है। वह जो देखता है उसके प्रति उसकी अपनी व्याख्याएँ होती हैं। ज्ञान की संरचना उसके मस्तिष्क में होती है। सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में उसका यह ज्ञान जिसे हम पूर्वज्ञान की संज्ञा दे सकते हैं का अत्यधिक महत्व है। 
नया कुछ सिखाने के लिए हमें उसके अनुभवरूपी ज्ञान को ही पुर्नव्यवस्थित करना है। लेकिन होता यह है कि हम उसके ज्ञान की अवेहलना कर उसे पुस्तक में दिया गया या हमारे पास उपलब्ध ज्ञान को ही परमसत्ता के रूप में दर्शाने का प्रयास करते है। ऐसे में वह अपने ज्ञान का निर्माण नहीं कर पाता। अंततः उसके पास रटने के अलावा कोई उपाय नहीं बचता।
इस नए परिपेक्ष्य में हमें हमारी भूमिका को पुनःसंरचित करना होगा। हमें ज्ञान केे वाहक की भूमिका से हटकर विद्यार्थी के सहयोगी की नई भूमिका में अपने आप को रखना होगा। हम सुविधादाता के रूप में उसके लिए कक्षा - कक्ष में ऐसा वातावरण बनाएँ जो ज्ञान के निर्माण को प्रोत्साहित करे। बच्चों के अनुभवों को बराबर तरजीह देते हुए, उन्हें संवाद बनाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा ताकि वह अपने आप को अभिव्यक्त करने का कौशल सीख सके। हमारी कक्षाओं का वातावरण सक्रिय और उत्साह से भरा हो ताकि बालक अपनी स्वाभाविक हिचक को तोड़कर प्रत्येक क्रिया में सहभागी बन सके।
  पर्यावरण अध्ययन विषय इन बातों से और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि यह बच्चों की विद्यालयी दुनिया को उनकी बाहरी दुनिया यानि उनके परिवेश से जोड़ता है। ऐसा तब ही संभव होगा जब हमें उन्हें उनके परिवेश के अनुभवों को कक्षा में साझा करने के अवसर पैदा करेंगे। ऐसा करने के लिए हमें उन्हें  बाहरी चीजों के समक्ष ले जाना पड़े ऐसे अवसरों को प्रोत्साहित करना होगा। अतः शिक्षक की भूमिका एवं कक्षा व्यवस्था, हम शिक्षको से एक बडे बदलाव की अपेक्षा रखती है।
प्राथमिक कक्षाओं में बच्चे खेल के द्वारा अच्छी तरह से सीखते हैं। वे विभिन्न वस्तुओं के द्वारा अपने प्रयोग करते हैं। नई नई बातें खोजने की सहज जिज्ञासा हर बच्चे में होती है। वे अपने अनुभवों के आधार पर नई बातों और नई चीजों को अपने अर्थ देते है। हमे अपने शिक्षण के द्वारा उनको उनके परिवेश को समझने के ऐसे अवसर प्रदान करने हैं, जिनसे वे अपने भौतिक और सामाजिक पर्यावरण से रूबरू होते हुए रचनात्मक क्रिया - प्रतिक्रिया कर सकें। इस प्रकार वे खेल आधरित अनुभवों के द्वारा न केवल क्रियात्मक ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे, अपितु नया जानने की उनकी जिज्ञासा को भी पोषण मिलेगा।
बतौर शिक्षक हमें बच्चों को यह अहसास कराना होगा कि उनके मन में जो विभिन्न प्रश्न उठते हैं और जिनके उत्तर भी वे अपने अनुसार बना लेते हैं। इन उत्तरों की जाँच संभव है। वे स्वयं जाँच कर गलत या सही का पता कर सकते हैं। हमें उन्हें ऐसी धारणाओं के जाँच किस प्रकार हो इसकी सुविधा प्रदान करनी होगी तथा बार बार उन्हें इस प्रकार की जाँच प्रक्रियाओं से गुजरने के लिए प्रोत्साहन और अवसर देने चाहिए।  
यदि हम ऐसा करते हैं तो अमूर्त सी दिखने वाली इन बातों को हम विद्यार्थियों के व्यवहार में मूर्त रूप में देख पाएँगे। हम देखगें कि हमारे विद्यार्थी अब अवलोकन करने लगे हैं साथ ही सूक्ष्म अवलोकन की क्षमता भी कुछ विद्यार्थियों में विकसित होती दिखेगी। वे अपने प्रश्न बनाने लगेंगे। समूह में कार्य करने की उनकी क्षमता में शनैः शनैः वृद्धि परिलक्षित होने लगेगी। यानि वे सीखने - सिखाने की प्रक्रिया में अवलोकन करना, पहचान करना, जाँच करना, स्मरण करना, वर्णन करना तथा अपने पर्यावरण के साथ संवेदनशील तादात्मय स्थापित करना जैसे कौशलों का विकास होने लगेगा। वास्तव में यह व्यावहारिक शिक्षा होगी जो उनको उनकी रोजमर्रा की समस्याओं को सुलझाने में प्रोत्साहित करेगी।  
पर्यावरण-अध्ययन के सीखने - सिखाने की प्रक्रिया में अपने विचारों और परिकल्पनाओं को दूसरों के सामने रख कर उनकी चर्चा होना बहुत जरूरी है। हम शिक्षकों को कक्षा में संवाद एवं विचार-विमर्श का माहौल बनाने के लिए अवसर पैदा करने होंगे। जब आप कक्षा में ऐसा माहौल प्रेरित करेंगे तो आप पाएँगे कि विद्यार्थियों के पूर्वज्ञान में अनेक घटनाओं या बातों के प्रति अंधविश्वास प्रकार की भ्रम, भ्रान्तियाँ भी हो सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों को हमें बड़े ही संवेदनशील ढंग से निपटाना होगा। हमें उसके भ्रम, भ्रान्तियाँ को दूर करने के लिए उसकी जिज्ञासा का और पोषण करना होगा उसे उस स्थान तक लेजाना होगा जहाँ पर उसके मन में उस धारणा और विश्वास के प्रति एक अंसतोष पैदा हो। इस सब के लिए हम चाहे तो प्रश्न पूछ कर उसे उस बिंदु तक ले जा सकते है या फिर उसे सही तथ्य उदाहरण सहित समझा कर ऐसा कर सकते है। 
पर्यावरण अध्ययन के सीखनेे- सिखाने की प्रक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए हमें शिक्षण की अपेक्षा अधिगम का माहौल बनाना आवश्यक है। इसके लिए हमें स्थानीय, सक्रिय क्रियाकलापों, परियोजनाओं, फील्ड विजिट, व अन्यान्य नवाचारी उपायों को अपनाना होगा। पुस्तक में दी गई गतिविधियों से इतर हमें अपनी आवश्यकता के अनुसार गतिविधियों को बनाना होगा। तभी पर्यावरण अध्ययन जीवन से जुड़ पाएगा और अपने प्रेक्षण, पहचान और वर्गीकरण करने के कौशल विकसित करने जैसे उद्देश्यों को पूरा कर पाएगा। प्राकृतिक और सामाजिक परिवेशों के अन्तर्संम्बन्धों पर जोर देते हुए बच्चों में पर्यावरण की समग्र तथा समेकित समझ विकसित करना के लिए पाठ्यवस्तु में सम्मिलित कुछ संवेदनशील मुद्दों यथा- जेन्डर संवेदनशीलता, अन्यथा सक्षम लोगों के प्रति व्यवहार व अच्छा काम गंदा काम आदि के प्रति हमें उनकी धारणओं के विपरीत काम करना पड़ सकता है। इसलिए इन मुद्दों पर बहुत ही संवेदनशील ढंग बच्चों की समझ को परिमार्जित करने की ही बच्चों को सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशील बनाना और उनमें भिन्नता और बहुलता के लिए आदर भाव विकसित करना सरीखे़ उद्देश्य  की प्राप्ती संभव है। इन सभी उद्देश्य के पीछे हम देखें तो पाएँगे कि ये सब जीवन जीने की पद्धति को सिखाने का ही तो प्रयास है।


प्रमोद कुमार चमोली
साभार शिविरा पत्रिका दिसंबर २०१४


5 comments:

  1. अच्छा आलेख। प्राथमिक स्तर पुस्तकें हटाकर प्रतिदिन की परिस्थियों के अनुरूप सीखने में मदद करना होगा। औपचारिकताएं जैसे वार्षिक योजना आदि नहीं चल सकती। अध्यापक की ईमानदारी पर ही कार्य चलेगा। अभी सर्दी के सन्दर्भ में विज्ञान सामाजिक ज्ञान आदि बहुत कुझ बताया जा सकता है। होना सभी कुछ मूर्त चाहिए।

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    1. शुक्रिया आभार विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी जी

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  2. मौसम बदला बदला क्यों?
    पानी रूप बदलता है।
    नन्हा चना धरा में धँसकर
    अंकुर /पौधा बनता है।
    चंदा कितने स्वाँग बनाता?
    जलचर,नभचर कितने हैं?
    खुद गिनने दो मुझको,भाषा
    में स्वर कितने हैं?

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  3. क्‍पसपच श्रंपदOctober 12, 2015 at 9:43 PM

    धन्‍यवाद प्रमोद जी

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  4. बहुत खूब लिखा है गुरु जी।।(भारत भूषण जोशी, डी.एल एड.ट्रेनीज डायट अल्मोड़ा)

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