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Friday, January 3, 2014

थ्री डी प्रिंटिंग - एक नवीन तकनीकी


 
पिछले तीन दशकों से एक नई वैज्ञानिक क्रांति विश्वभर में चर्चा में आई है। यह है 'त्रि-आयामी प्रिंटिंग तकनीक' (Three Dimensional Printing Technology)। इसे 'एडिटिव मेन्यूफेक्चरिंग (additive manufacturing) तकनीक' भी कहते हैं। एडिटिव मेन्यूफेक्चरिंग वह तकनीक है जिसमें परत दर परत जमा कर वस्तु बनाई जाती है।

मान लीजिए अगर आपके घर के किसी उपकरण का कोई पुर्जा टूट गया है या खराब हो गया है तथा आपके पास थ्री डी प्रिंटर है और आप उसे तुरंत बना कर अपनी परेशानी दूर कर दें तो कितना अच्छा होगा। जी हाँ, भविष्य में यह संभव होने जा रहा है। नई थ्री-डी प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी आपकी कई सारी मुश्किलों को हल कर देगी।
त्रि-आयामी प्रिंटिंग तकनीक की सहायता से जैव तकनीकी के लिए कृत्रिम मानव अंग, रोजाना के काम की चीजे, औद्योगिक उपकरण, पुर्जे तथा अन्य सामान, आभूषण, चश्मे, जियोग्राफिक इन्फॉर्मेशन सिस्टम्स, कृषि के औजार, भवन निर्माण सामग्री, दंत चिकित्सा के सामान, कपड़े, फुटवियर, ऑटोमोबाइल व वैमानिकी उपकरण, सैन्य साज-सामान, अभियांत्रिकी की डिजाइन, खाने पीने की चीजे और कई दूसरे क्षेत्रों की चीजें सरलतापूर्वक बनाई जा सकेगी।

दुनिया का प्रथम त्रि-आयामी या थ्री-डी प्रिंटर सन् 1984 में थ्री डी सिस्टम कॉर्पोरेशन के श्री चक हल (Chuck Hull) ने बनाया था। इसके बाद तीन दशकों में इसमें बहुत सारा विकास हुआ है।

कैसे काम करता है यह त्रि-आयामी प्रिंटर-

थ्री डी प्रिंटर साधारण प्रिंटर की तरह ही होता है। बस अंतर इतना है कि इसका प्रिंट आउट कागज की प्लेन द्वि-आयामी शीट की तरह साधारण नहीं होता है बल्कि इसमें एक के ऊपर एक, विभिन्न परतें जमाते हुए इच्छा अनुसार त्रि-आयामी वस्तु को बनाया जाता है। इस प्रिंटर में अलग-अलग प्रकार की सामग्री बनाने के लिए अलग-अलग 'मेटेरियल-कॉर्ट्रेज' तथा अलग-अलग डिजिटल प्रोग्राम होते हैं। जैसे प्लास्टिक की वस्तु के लिए प्लास्टिक कॉर्ट्रेज होता है जबकि धातु की वस्तु बनाने के लिए धातु का कॉर्ट्रेज काम में लेना होता है। लेकिन अगर आपको प्लास्टिक तथा धातु दोनों ही से बनी मिश्रित वस्तु चाहिए तो दोनों को ही काम में लेना होगा।
अर्थात अगर आप कोई प्लास्टिक की वस्तु चाहते हैं या फिर धातु की या फिर प्लास्टिक और धातु दोनों की मिश्रित। तो उसके अनुरूप अपनी आवश्यकता के अनुसार उस वस्तु के निर्माण का प्रोग्राम और इसका सामग्री का कॉर्ट्रेज चयन करके मनचाही वस्तु प्राप्त कर सकेंगे। थ्री डी प्रिंटर में एक महीन छेद वाली नोजल होती है, जो आइसक्रीम बनाने वाली मशीन की नोजल से मिलती-जुलती होती है किंतु यह आइस्क्रीम बनाने के नोजल की तरह मोटी न होकर महीन होती है। इस महीन नोजल से कार्ट्रेज से मेटेरियल निकलता है और कंप्यूटर प्रोग्राम के अनुसार कुछ ही देर में मनचाही वस्तु तैयार हो जाती है।
अमेरिका में थ्री डी प्रिंटर से आम चीजों के अलावा पिस्तौल व राइफल आदि हथियार भी बनाए जा रहे हैं जो इस टेक्नोलॉजी का एक चिंताजनक पहलू भी है।

***दुःखियों का सहारा बनेगा थ्री डी प्रिंटर- इससे बनाए जा सकेंगे मानव अंग-***

संपूर्ण विश्व में प्रतिवर्ष अंग प्रत्यारोपण के लिए रोगियों को अंगदाता नहीं मिल पाते हैं तथा उनकी मौत हो जाती है। त्रिआयामी प्रिंटर ऐसे लोगों के बड़े सहारे के रूप में उभरने वाला है क्योंकि इससे मानव अंग बनाए जाने की तकनीक का तेजी से विकास किया जा रहा है। स्टेम सेल चिकित्सा तथा बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में 'थ्री-डी प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी' एक वरदान सिद्ध होने जा रही है। 'थ्री-डी प्रिंटर' से वर्तमान में सर्जिकल इम्प्लांट्स जैसे कूल्हों और घुटनों के प्रत्यारोपण की सामग्री बनाई जा रही है किंतु जल्दी ही अन्य मानव अंग भी बनाए जाने की संभावना है। इस तकनीक से मानव अंग बनाने के लिए प्रयोगशाला में बनाई गई मानव कोशिकाओं (स्टेम सेल्स) को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल किया जायेगा। ब्रिटिश वैज्ञानिकों ने एक खास नोजल विकसित करके इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने इस नोजल की सहायता से मानव कान का प्रिंट प्रयोगशाला में तैयार करने में सफलता हासिल की है। पिछले दिनों ब्रिटेन के कैंम्ब्रिज विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने थ्रीडी टेक्नोलॉजी से आँख के पर्दे (रेटिना) की कोशिकाएँ प्रिंट करने में सफलता हासिल की है जिससे दृष्टिहीनता के उपचार में क्रांति आ सकती है। इन वैज्ञानिकों ने चुहों की रेटिना कोशिकाओं को थ्रीडी प्रिंटर से प्रिंट किया और पाया कि इस क्रिया में कोशिकाओं को कोई नुकसान नहीं हुआ व वे जीवित रही। वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि खराब कोशिकाओं के स्थान इन कोशिकाओं को आँख में स्थापित करके आँख का उपचार किया जा सकता है। वैज्ञानिक अब मानव लिवर और हड्डियों को भी थ्री-डी प्रिंटर से बनाने में प्रयत्नरत हैं।
मानव अंग निर्माण की दिशा में कार्यरत मेलबर्न टीटीपी नामक कंपनी का दावा है कि वे थ्री-डी प्रिंटर से शीघ्र ही कई मानव अंग बना लेंगे तथा अगले 10 वर्षों में वो मानव अंग प्रत्यारोपण के लिए डोनर्स की आवश्यकता ही समाप्त कर देंगे।
Prakash Joshi B, Kamlesh Joshi, Shniter Kumar Bishnoi and 14 others के साथ.

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