Total Pageviews

Monday, November 21, 2011

एक आत्मीय पाती


मित्रों आज इस ब्लॉग में शिक्षा विभाग राजस्थान की पत्रिका शिविरा के बारे में चर्चा करने का मन हो आया है।शिविरा से आप सभी सृजनशील साथी परिचित हैं।यह हमारे विभाग की पत्रिका है।जो सरकारी विद्यालयों को निःशुल्क उपलब्ध करवाई जाती है।इसमें सरकारी आदेशों के साथ शिक्षा पर चिंतनपरक आलेख प्रकाशितहोते हैं।आप और हम गाहे बगाहे विद्यालय में इसे खोलकर अवश्य देखते है।मित्रों यह हमारे विभाग का मुखपत्र है।आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वर्तमान में इसके व्यक्तिगत शिक्षक व निजी संस्थाओं की ग्राहक सदस्य संख्या मात्र 2525 ही है।क्या इतनी कम सदस्य संख्या हमारे स्वाध्यायी होने पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाती।मुझे व्यक्तिगत तौर पर इतने बड़े विभाग की पत्रिका के इतने कम सदस्य होना बहुत खेदजनकलगा है। मेरा यह मानना है कि हमें शिविरा तो कम से कम पढनी ही चाहिए।    
     मित्रो आप लोग सोच रहें होंगे की मैं शिविरा की वकालत क्यों कर रहा हूँ।इसका भी कारण है। बात दरअसल 
यह है कि मुझे एक पत्र मिला मेरे पास स्केनर की सुविधा नहीं है इसलिए इस पत्र को हुबहु टाईप कर आप से 
शेयर करता हूँ।


आयुक्त की पाती शिक्षकों के नाम
मिशन 50,000


प्रिय शिक्षक भाइयों/बहिनों
  • स्वध्याय और चिन्तन भारतीय दर्शन के सर्वाधिक दो महत्वपूर्ण उपागम है। गुरुकुल में शिक्षा पूर्ण कर प्रस्थान करने से पूर्व दीक्षा संस्कार के समय गुरु जो महत्वपूर्ण शिक्षा अपने शिष्यों को देता है उनमें एक स्वाध्याय से प्रमाद मत करना भी सम्मिलित है।
  • विगत कुछ समय से लगता है जैसे स्वाध्याय की आदत में कमीं आ रही है। शिक्षक तो स्वाध्याय का पर्याय होना चाहिए। कदाचित इसके पीछे एक कारण टेलिविजन संस्कृति है, जो भी हो कुछ न कुछ पढ़ना लिखना तो चलते रहना चाहिए। कहा भी है-

             कुछ लिख के सो
                  
              कुछ पढ़ के सो
         
            तू  जिस जगह जागा सवेरे 
                 
            उससे कुछ आगे बढ़ के सो। 



  • स्वाध्याय के लिए युवाओं को प्रेरित करने के लिए जापान ने वर्ष 2010 को राष्ट्रीय अध्ययन वर्ष के रूप में मनाया और इस अवधि में पुस्तक एवं पुस्तकालय संस्कृति को बढावा देने के लिए वर्षपर्यन्त कार्यक्रम किये।
  • अपने व्यवसाय में दक्षता हासिल करने के लिए हर व्यक्ति यत्नशील रहतह है। क्सा वकील, क्या इंजीनिसर , क्या डॉक्टर, और क्या वैज्ञानिक.......इस हेतु वे अपने व्यवसाय से संबंधी पत्र-पत्रिकाएं मंगवाते हैं और तत्विषय प्रशिक्षणों में अपने व्यय पर भाग लेने जाते हैं।
  • शिक्षक के लिए तो हर समय अध्ययनशील बने रहना आवश्यक है। एन.सी.ई.आर.टी. नई दिल्ली व शिक्षा विभाग व अन्य अभिकरणों से कई पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती हैं। इनमें शिविरा एवं नया शिक्षक प्रमुख हैं।
  • शिविरा के वर्तमान में व्यक्तिगत शिक्षक ग्राहकों एवं निजी संस्थाओं की संख्या केवल 2525 है। इससे निराशा होनी स्वाभाविक है। मैं चाहता हूँ कि सभी शिक्षक कम से कम शिविरा तो पढें हीं। पढें और लिखें भी। आखिर शिविरा है किसकी? आपकी ही तो है-Shivira is a magzine of the teachers for the teachers and by the teachers.
  • आइये हम शिविरा के ग्राहक बनकर हमारे स्वाध्याय यज्ञ में आहुति दें। इस स्वाध्याय यज्ञ में अपनी आहुति स्वरूप मैं प्रधान सम्पादक होने पर भी निजी तौर पर सदस्यता शुल्क जमा करवाकर शिविरा का सदस्य बन रहा हूँ।


                शुभकामनाओं के साथ,
                                                                                        ह.
                                                                                        भास्कर ए. सावन्त
                                                                                              आयुक्त
                                                                                   माध्यमिक शिक्षा , राजस्थान
                                                                                                 बीकानेर 



मुझे इस आत्मीय पत्र को पढ कर ऐसा लगा कि आयुक्त महोदय का शिक्षा के प्रति चिन्तन वाकई सराहनीयहै।हालांकि ये दीगर बात है कि सावन्त साहब अब आयुक्त नहीं हैं।मित्रों मेरा मानना है कि जब आयुक्त महोदय जो प्रशासनिक अधिकारी हैं स्वयं शिविरा के ग्राहक बनें हैं तो हमें भी शिविरा का ग्राहक बन हमारी यानि शिक्षकों की पत्रिका शिविरा को अवश्य ही पढ़ना चाहिए।एक बात यह भी कि आखिर शिविरा का वार्षिक शुल्क है ही कितना मात्र 50 रूपये।शिविरा शिक्षकों की सृजनशीलता को मंच भी प्रदान करती है। इसके माध्यम से हम अपने मौलिक विचारों को बड़े स्तर पर अपने शिक्षक साथियों से साझा भी कर सकते हैं। इसलिए हम सृजनशील शिक्षकों को इसके लिए लिखना भी चाहिए।

प्रस्तुति -प्रमोद कुमार चमोली 

No comments:

Post a Comment