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Monday, September 5, 2011

हम शिक्षक: राष्ट्र निर्माता

मित्रो ये आलेख तीन साल पहले लिखा था पर कही भेजा नहीं सोचा आज शिक्षक दिवस पर आप लोगो के समक्ष रखु और इस बारे में आप के विचार जानू 

हम शिक्षक: राष्ट्र निर्माता

माईसैल्फ ................. आई एम डॉक्टर, मेरा नाम ................. है। मैं पेशे से वकील हूँं मैं .......................... हूँ। मैं इंजीनीयर हूँ, भई हम तो पूरे देश के विकास की घुरी है। जी ...... मेरा  नाम ........................... मैं दुकानदार हूँ। लोगों   से परिचय के दौरान हमें ऐसा दिखाई पड़ता है। सभी लोग अपना परिचय पेशे के साथ जोड़ते हुए गौरवशाली ढंग से देते हैं। हम शिक्षक अपना परिचय देते हुए हिचकिचाते हैं फिर अतिविनम्रता का लबादा ओढ़ कर कहते हैं जी मेरा नाम .................. मैं मामूली सा शिक्षक हूँ। हम अपने परिचय में स्वयं को दीन-हीन निरीह बताने का प्रयास करते है। क्यों ? आखिर क्यों ? हम मामूली सा अदना सा जैसे विशेषणों का प्रयोग कर स्वयं को व अपने पेशे को गरिमा हीन करते है। आखिर इतना हीनता का भाव क्यों है हम शिक्षकों में ? 
  यह सही है आज समाज में शिक्षक का सम्मान पहले जैसा नहीं है। शिक्षा और शिक्षक पर छीटांकशी व तानों के तीर यत्र-तत्र-सर्वत्र कानों में  सुनाई पड़ते हैं। ‘‘शिक्षा का स्तर गिर रहा है, शिक्षक काम नही करते’’ ऐसी बाते हमें हताश करती है।  हम कुछ कर पाने में स्वयं को सक्षम नहीं पाते और धीरे-धीरे समाज की नकारात्मक भावना हमें अपने नागपाश में जकड़ लेती है। शायद हम इन्हीं कारणों के चलते अपने आपको गरिमा हीन दिखाकर नकारात्मक व्यवहार प्रदर्शित करते है।
              लेकिन क्या इस तरह का गरिमाहीन व्यवहार करना समस्या का हल है। शिक्षकों का समाज में सम्मान नहीं है। यह रोना रोते रोते शिक्षकों की कई पीढ़िया सेवानिवृत्त हो चुकी है। समाज से सम्मान का सर्टिफिकेट हमारे लिए इतना जरूरी हो गया कि उसके बगैर हमारा काम नहीं चल सकता।
हमारे लिए यह गौरव की बात नहीं कि हम अतीत के अनेक महान गुरूओं व शिक्षकों संदीपनी, द्रोणाचार्य, रामकृष्ण परमंहस, डा. राधाकृष्णन व डा. जाकिर हुसैन जैसे लोगों की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते है।
किसी भी राष्ट्र की प्राण शक्ति उसके विद्यालय हैं। यहीं पर भावी भारत जिसकी छत्र छाया मे तरूणाई प्राप्त करता है। जिसके ज्ञान आलोक से आलोकित होता है वह और कोई नहीं हम शिक्षक ही तो है।
हमारे लिए यह गौरव का विषय नहीं है कि हमने वेतन भोगी व्यवस्था में भी व्यवसाय के रूपमें शिक्षण जैसा बौद्धिक कार्य चुना है। हमारे व्यवसाय में हमारे साध्य निर्जीव फाइल व हृदयहीन फाईल नोट्स न होकर सजीव बच्चे हैं। जिनकी ताज़गी हमारे जीवन को तरो ताज़ा बनाए रखती है। इसी ताज़गी के कारण तमाम आलोचनाओं के बावजूद भी शिक्षक अन्य पेशे के लोगो से अधिक लगन से कार्य करते है।
आज परिस्थितयां भी पहले जैसी नहीं है। समाज में सूचना के माध्यम से ज्ञान का विस्फोट हो रहा है। इस ज्ञान के विस्फोट को नियंत्रित करने वाला कोई और नहीं शिक्षक ही है। शिक्षा मे अनेक युक्तियों के प्रयोग कि बावजूद भी शिक्षण में शिक्षक की भूमिका बराबर बनी हुई है। आज शिक्षक बनना भी कोई हंसी खेल नहीं है। उच्च मैरिट या प्रतियोगी परीक्षा द्वारा चयनित होना आसमान से तारे तोड़ने के समान हैं। फिर भी हम अपने आपको......................
शिक्षक बौद्धिक, शारीरिक क्षमताओं में भी किसी से कम नहीं है। अब वेतन परिस्थितयां पहले जैसी नहीं है। वेतन इतना ज्यादा तो नहीं जितना इस बौद्धिक कार्य के लिए होना चाहिए फिर भी अति सादगी पूर्ण ढंग से जीवन यापन करने के लिए कुछ हद तक पर्याप्त है। यानि समर्थ होते हुए भी लाचारी प्रदर्शित करना हमारी आदत बन चुका है।
आज समाज बुरी तरह त्रस्त नजर आ रहा है। भ्रष्टाचार की विष बेल ने ईमानदारी के वृक्ष का जकड़ रखा है। भाई-भतीजावाद, जातिवाद जैसी न जाने कितनी बुराईयां समाज को झक़झोर रही हैं। ऐसी स्थिति में भी शिक्षक निरपेक्षता व बिना लाग-लपेट के अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा हैं। ईमानदारी के मुर्झाते वृक्ष की जीवित शाखा के रूप मे अढिग खड़ा है। क्या यह हमारे लिए गौरव की बात नही है ?
मैं बड़े विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि समाज में व्याप्त बुराईयों को दूर करने के लिए यदि कोई हैं तो वह शिक्षक ही है। समाज को कायम रखने व उसे सही दिशा में ले जाने वाली रोशनी दिखाने वाला कोई है तो वह शिक्षक ही है। 
  समाज में शिक्षक का महत्व आज भी पहले जैसा ही है। बल्कि आज समाज में आई विद्रूपताओं को देखते हुए उसका महत्व और भी अधिक हो गया है। आज जब नैतिकता, परोपकार व सहिष्णुता जैसे मानवीय गुण किताबो  के पन्नो मे सिमट गए हैं। भय, निराशा, अराज़कता व अनुशासनहीनता के माहौल में समाज यदि किसी की ओर आस्था और विश्वास की दृष्टि से देखता है तो वह शिक्षक ही है। ध्वसं होती व्यवस्था में बदलाव और बुराईयों को समाप्त करने की क्षमता यदि उसे किसी में दिखाई पड़ती है तो वह शिक्षक ही हैं। जब समाज हम पर भरोसा करके समाज में सुधार की उम्मीद करता है तब क्या हम दीन, हीन, गरीब, लाचार व बेचारा बनकर किसी बहुत बडे़ परिवर्तन को अंज़ाम दे सकते हैं।
आज जरूरत है शिक्षक को अपनी क्षमता पहचानने कि, विषयज्ञान कराने वाली भूमिका से उपर उठकर सही मायने में शिक्षक की भूमिका अदा करके समाज को सही रास्ता दिखाने।  यह सब हम तब ही कर पाऐगंे जब हम गर्व से सीना तानकर यह करगे कि ‘‘हम शिक्षक है हम राष्ट्र निर्माता है।’’

1 comment:

  1. very nice feelings with motivational one ur devotion to improve dedication in teachers is really appriciable salute to u& creative teacher

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