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Sunday, June 12, 2011

एक अभिनव प्रयास ....

मित्रो इस ब्लॉग के माध्यम से आप शिक्षा पर अपना चिंतन आलेख के रूप में मेरे मेल pkchamolibkn@gmail.com पर भेज सकते हैं |हमारा प्रयास है आप के विचारो को समस्त रचनाशील साथियो तक पहुचाने का रहेगा | इस ब्लॉग का उद्देस्य यही है की हम चिंतनशील साथी मिलकर मंथन करे और शिक्षा की बेहतरी के लिए प्रयास करें |आशा है आप का रचनात्मक सहयोग मिलेगा |इसी क्रम में उदैपुर के साथी प्रकाश जोशी का आलेख आप के समक्ष रख रहा हूँ |प्रकाश जी siert udaipur में कार्यरत है आप विगत कई सालो से विज्ञानं मेले के आयोजन से जुड़े है |विज्ञानं की कई पुस्तको का लेखन कर चुके है |साथ ही आप लेखन के क्षेत्रमें भी सक्रीय है | प्रस्तुत है प्रकाश जी का ये आलेख -

विज्ञान ऋषि डॉं. दौलत सिंह कोठारी
सत्य, अहिंसा, वसुधैव कुटुम्बकम् और सत्यमेव जयते की धरा भारत-भूमि पर अनेक चिंतक, विचारक, वैज्ञानिक और समाज सुधारक मनीषी अवतरित हुए ह,ैं जिन्हांेने अपने प्रेरणादायी कर्मों से देश के समग्र विकास में अतुलनीय योगदान दिया है। ऐसे ही एक महान् मनीषी डॉं. दौलत सिंह कोठारी थे, जो विश्व-विख्यात वैज्ञानिक होने के साथ-साथ प्रबुद्ध चिंतक और शिक्षा शास्त्री भी थे। ‘‘दबाव आयनीकरण के सिद्धान्त‘‘ की खोज तथा ‘‘श्वेत वामन तारों‘‘ की बनावट संबंधी अनुसंधानों ने एक ओर उन्हें भौतिक विज्ञानी के रूप में जग-प्रसिद्धि दिलाई, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (कोठारी आयोग) एवं विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के प्रथम अध्यक्ष के रूप में इस महान् शिक्षाविद् द्वारा निर्धारित की गई नीतियाँ आज भी प्रासंगिक बनी हुई है।
हमारे लिए एक गौरव का विषय है कि डॉ. डी. एस. कोठारी का जन्म 6 जुलाई 1906 में राजस्थान के उदयपुर शहर में हुआ। इस समय उदयपुर मेवाड़ राज्य की राजधानी था। उनके पिता श्री फतहलाल कोठारी एक शिक्षक थे। जब वे केवल 12 वर्ष के ही थे कि उनके पिता का देहावसान हो गया। चार भाईयों तथा एक बहन में सबसे बड़े श्री कोठारी के जीवन में यह वज्रपात का क्षण था। कम उम्र में ही पिता के निधन से परिवार पर घोर आर्थिक संकट की स्थिति हो गई थी। उनकी धर्मपरायणा व सहृदय माता ने कष्ट झेलते हुए उन्हें प्रारम्भिक शिक्षा दिलाई। तत्पश्चात् उनके पिता के मित्र एवं तत्कालीन इन्दौर राज्य के दीवान श्री सिरेमल बापना उन्हें अपने बच्चों के साथ पढाने के लिए इन्दौर ले गए। यहाँ उन्होंने महाराजा शिवाजी राव हाई स्कूल से मेट्रिकुलेट की परीक्षा उतीर्ण की। इसके पश्चात् वे पुनः उदयपुर लौट आए। यहाँ उन्होंने सन् 1924 में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान तथा गणित में विशेष योग्यता के साथ इंटरमीडिएट परीक्षा उतीर्ण की। इस परीक्षा में वे समूचे राजपूताना शिक्षा बोर्ड की मेरिट में प्रथम स्थान पर थे। उनकी इस विलक्षण प्रतिभा से प्रसन्न होकर महाराणा मेवाड़ ने उन्हें आगामी अध्ययन के लिए उस समय बहुत अच्छी समझी जाने वाली राशि 50 रु. माहवार की छात्रवृत्ति स्वीकृत की। सन् 1926 में डॉ. कोठारी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में बी.एस.सी. तथा सन् 1928 में एम.एस.सी. (भौतिक विज्ञान) की डिग्री प्राप्त की। एम.एस.सी में उनके अध्यापक प्रसिद्ध वैज्ञानिक मेघनाद साहा थे। एम.एस.सी में उनका विशिष्ट विषय ‘‘वायरलेस‘‘ (इलेक्ट्रॉनिक्स) था। कष्टों मुसीबतों और मजबूरियां न जाने क्यों प्रतिभाओं के साथ हम सफर बनी रहती है। डॉ. कोठारी के साथ भी ऐसा ही होता रहा। मजबूरन आर्थिक संकट के कारण वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिक विज्ञान विभाग में डिमोन्स्ट्रेटर के पद पर नौकरी करने लगे किंतु इस होनहार के मन में विज्ञान के क्षेत्र में कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी। एम.एस.सी. में मेरिट में प्रथम रहने के कारण शीघ्र ही उन्हें यूनाईटेड प्रोविन्स राज्य (वर्तमान उत्तर प्रदेश) सरकार ने विदेश अध्ययन के छात्रवृत्ति प्रदान की और महाराणा मेवाड़ ने उनके परिवार के पालन-पोषण के लिए ब्याज मुक्त ऋण स्वीकृत किया। अनुसंधान की बलवती इच्छा लिए सितम्बर 1930 में श्री कोठारी इंग्लैण्ड के लिए रवाना हुए तथा वहाँ उन्होंने केम्ब्रिज विश्वविद्यालय की केवेंडिश प्रयोगशाला में अनुसंधान कार्य प्रारम्भ किया और पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की। परमाणु संरचना एवं नाभिक की खोज के लिए नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक अर्नेस्ट रदरफोर्ड उनके मार्गदर्शक शिक्षक थे। पी.एच.डी. के पश्चात् वे डिमोन्स्ट्रेटर के पद पर पुनः लौट आए तथा 1934 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय में रीडर नियुक्त हुए। इस विश्वविद्यालय में तब केवल बी.एस.सी. तक ही शिक्षा ही दी जाती थी तथा विज्ञान विभाग किराए के भवन में चलता था। डॉ. कोठारी ने अपने प्रयासों से नवीन भवन तथा नवीन प्रयोगशाला बनवाई। 1944 में यहां आपने एम.एस.सी. तक की शिक्षा भी प्रारम्भ कराई। उन्होंने भौतिक वैज्ञानियों को आकर्षित कर एक ‘‘क्रियाशील अनुसंधान समूह‘‘ की स्थापना कर शोध कार्य प्रारम्भ किया। नवीन प्रयोगशाला की स्थापना के समय डॉ. कोठारी को महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन ने शुभकामना प्रेषित करते हुए सलाह दी- ‘‘उत्कृष्ट सहयोग भावना रखोगे तथा विचारों में पूर्वाग्रह लाए बिना प्रेम के साथ कार्य करोगे तो तुम सदैव प्रसन्न रहोगे और अपने कार्य में सफल रहोगे।’’ उनकी प्रयोगशाला की नील्स बोहर, ब्लेकेट, डिराक, सी.वी.रमण, होमी जे. भाभा, मेघनाद साहा आदि प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने अवलोकन कर भूरि-भूरि प्रशंसा की। यहाँ उन्होंने खगोल भौतिकी, प्लाज्मा भौतिकी, चुम्बकीय हाइड्रोडायनेमिक्स, क्वांटम इलेक्ट्रोडायनेमिक्स, आपेक्षिक क्वाटंम सांख्यिकी इत्यादि पर निरंतर शोध कार्य किए। उनके अनेक शोध पत्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुए। उनके द्वारा खोजा गया अत्यधिक उपयोगी ‘‘दबाव आयनीकरण सिद्धान्त‘‘ समूचे विश्व में अत्यंत सराहा गया। उनके इस सिद्धान्त के बारे में सर ए. एस. एडिंग्टन ने कहा कि ‘‘अब तक हम सभी जानते थे कि आयनीकरण केवल उच्च दाब व उच्च ताप द्वारा ही संभव है। डॉ. कोठारी एक मात्र वैज्ञानिक है जिन्होंने यह बताया कि बिना उच्च ताप के केवल दबाव से ही आयनीकरण संभव है।’’
आसमान में चमकते तारों का सौन्दर्य सबको लुभाता है पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लबरेज व्यक्तित्व ही इस सुन्दरता के राज को जानने की कोशिश करता है। डॉ. कोठारी का अप्रतिम सौन्दर्यबोध और उच्च कोटि का वैज्ञानिक दृष्टिकोण चंदा तारे और आकाश के रहस्यों को जानने के लिए काफी था। उन्होंने श्वेत वामन तारों के रहस्य को खोलकर सबके सामने रख दिया। प्रसिद्ध वैज्ञानिक अरनॉल्ड समरफील्ड ने डॉ. कोठारी द्वारा श्वेत वामन तारों की बनावट के संबंध में किए जा गए अनुसंधान की सराहना करते हुए कहा कि ‘‘कोठारी ने खगोल अनुसंधान के क्षेत्र में नए आयाम खोले हैं।’’ इस तरह यह कहना अतिशियोक्ति नहीं होगा कि डॉ. कोठारी विश्व के वैज्ञानिक मानचित्र पर देश की राजधानी दिल्ली को प्रतिष्ठापित करने वाले पुरोधा वैज्ञानिक थे।
डॉ. कोठारी की विलक्षण अनुसंधान प्रतिभा को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1949 में रक्षा मंत्रालय के प्रतिरक्षा विज्ञान संगठन का निदेशक नियुक्त किया तथा उन्हें रक्षा मंत्री का वैज्ञानिक सलाहकार भी बनाया, जहाँ वे 1961 तक कार्यरत रहे। इस पद पर रहते हुए उन्होंने अत्यन्त कम धनराशि में शस्त्र विज्ञान, वैमानिकी धातुकर्म, खाद्य संरक्षण आदि के क्षेत्र में अनेक प्रयोगशालाओं की स्थापना कराई। स्वर्गीय प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु की प्रेरणा से आप जीवन पर्यन्त शांति स्थापना और राष्ट्र निर्माण के लिए प्रयत्नरत रहे।
डॉ. कोठारी ने भारतीय भौतिक विज्ञान सोसायटी, भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (73-74), भारतीय विज्ञान कांग्रेस (1962), हिन्दी आयोग (तकनीकी), वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग के अध्यक्ष पद पर रहते हुए विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के कार्य में अग्र्रणी भूमिका का निर्वहन किया । आपकी श्रेष्ठ नेतृत्व क्षमता को देखते हुए आपको जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली का कुलपति भी नियुक्त किया गया।
शिक्षा जगत को डॉ. कोठारी द्वारा दिए गए अवदान से भला कौन परिचित नहीं है। वे देश में उच्च शिक्षा के विकास के लिए गठित विश्व विद्यालय अनुदान आयोग के प्रथम अध्यक्ष भी थे। 13 वर्षों के कार्यकाल मे आपके नेतृत्व में देश में अनेक विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई तथा उनमें अनुसंधान कार्य भी प्रारम्भ हुए। 1961 से 1966 तक भारतीय शिक्षा आयोग के अध्यक्ष के रूप में आप द्वारा देश में प्रारम्भिक एवं माध्यमिक शिक्षा के उन्नयन के लिए सुझाई गई नीतियों से युक्त प्रतिवेदन आज भी शिक्षा जगत के धर्मग्रंथ की तरह सम्मानित है।
एक शिक्षक के रूप में डॉ. कोठारी ने वास्तव में शिक्षकीय जीवन जीया। उनका विचार था कि एक शिक्षक का दायित्व विद्यार्थियों को केवल पुस्तकीय ज्ञान प्रदान करना नहीं है, अपितु उन्हें सद्कर्मो को करते हुए स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ताकि विद्यार्थियों में चरित्रवान बनने तथा अर्जित ज्ञान का जनकल्याण में सदुपयोग करने की प्रेरणा मिले। शिक्षक को अपने विद्यार्थियों में संदेश थोपने की आवश्यकता नहीं है वरन् सद्-शिक्षक का चरित्रवान जीवन ही विद्यार्थियों एवं समाज के लिए पूर्ण संदेश है‘‘।
डॉ. कोठारी को अपने अविस्मरणीय योगदान के लिए 1962 में पदम भूषण, 1973 में पद्म विभूषण, 1988 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस प्लेटनम जुबली पुरस्कार, शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए नेशनल फेडरेशन ऑफ यूनेस्को फाउण्डेशन पुरस्कार, आचार्य तुलसी फाउण्डेशन ‘‘अणुव्रत पुरस्कार‘‘ इत्यादि से सम्मानित किया गया।
डॉ. कोठारी अत्यन्त सरल व सहज थे। उन्होेंने कभी अपनी महानता को प्रदर्शित नहीं किया। वे विभिन्न क्षेत्रांें यथा -विज्ञान ,रक्षा सेवा, शिक्षाशास्त्र एवं आध्यात्म इत्यादि के प्रबुद्ध विद्वान होने के साथ-साथ उच्च माननीय गुणों से परिपूर्ण व्यक्तित्व थे। अपने विद्यार्थियों ,सहकर्मियों, परिजनों और रिश्तेदारों के बीच उनकी सरल एवं सादगीपूर्ण कार्य शैली की भी बराबर सराहना होती थी। पूर्ण मनोयोग से समय पर गुणवत्तापूर्ण कार्य सम्पादित करना उनकी जीवन शैली का अंग था।
जैन धर्म के अनुयायी डॉ. कोठारी अहिंसा व गाँधीवाद के प्रखर समर्थक थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन निहायत ही सादगीपूर्ण ढंग बिताया। उनका मत था कि ‘‘विज्ञान सत्य की खोज का एक उपागम है। विज्ञान एवं तकनीक परस्पर संबंधित है तथा राष्ट्रीय विकास के लिए इनका उपयोग अति आवश्यक है। विज्ञान का उपयोग सभी व्यक्तियों, विशेषकर ंगरीबों व असहायों के विकास में होना चाहिए।‘‘ समाज में फैले हुए अंधविश्वास उनकी आत्मा को हर समय कचोटते थे। इसलिए उन्होंने विज्ञान का अंधविश्वासों के उन्मूलन में प्रयोग करने पर बल दिया। उन्होंने परमाण्वीय ऊर्जा का केवल मानव कल्याण में सदुपयोग करने को उचित ठहराया। उनका कहना था कि यदि परमाण्वीय ऊर्जा का विनाश के कार्यो में दुरूपयोग रोका न गया तो यह एक दिन संपूर्ण मानव सभ्यता को नष्ट कर देगी। इसकी झलक उन्होंने डॉ. होमी जे. भाभा के साथ संयुक्त रूप से लिखी अपनी पुस्तक ‘‘परमाणु विस्फोट और उसके प्रभाव‘‘ में प्रस्तुत की है। अतः वैज्ञानिकों को विज्ञान का प्रयोग रचनात्मक कार्यों के लिए करना चाहिए। वैश्विक अंसतुलन दूर करने के संबंध में उनका विचार था कि गरीब और धनी देशों के मध्य अंतर को पाटने के लिए विश्व में आत्मसंयम और अहिंसा की नितांत आवश्यकता है। उन्होंने समस्त मानव जाति के कल्याण, सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण जीवन हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का सार्थक उपयोग करने की वकालत की। डॉ. कोठारी ने राष्ट्रीय शिक्षा आयोग की रिपोर्ट में मूल्य आधारित शिक्षा प्रणाली पर बल दिया और कहा कि पर्यावरण, जल, स्वास्थ्य-देखभाल आदि वे क्षेत्र है जहाँ मानवीय मूल्यों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने एक बार अपने भाषण में कहा कि विज्ञान एवं तकनीक के विकास के साथ-साथ चारित्रिक विकास भी अति आवश्यक है।
बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी डॉ. कोठारी वास्तव में ‘‘एक विज्ञान ऋषि‘‘ थे। महान वैज्ञानिक, प्रखर चिंतक, संघर्षशील, कर्मठ एवं मानवतावादी डॉ. कोठारी का व्यक्तित्व सभी के लिए प्रेरणास्पद एवं अनुकरणीय है।
लेखक -प्रकाश जोशी

1 comment:

  1. Pramod ji,aapke dwara shandar shuruat ke liye badhai.Praksh ji ko thanx ,ki unhone mahatvapurn jankari di.Jis aim se ye shuruat hui hi uske liye best wishes.

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