Total Pageviews

Thursday, April 21, 2011

आठवीं तक फैल नहीं करने का निर्णय- उचित या अनुचित

राजस्थान के सरकारी विद्यालयों में आठवीं कक्षा तक इस वर्ष से किसी भी विद्यार्थी को अनुत्तीर्ण नहीं किया जाएगा। इस फैसले के बारे में कई शिक्षकों, शिक्षाविदों एवं अभिभावकों का कहना है कि आठवीं कक्षा में वास्तव में कमजोर सिद्ध हो रहे बच्चे को बिना फेल किए अगली कक्षा में भेजना शिक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ है। ये बच्चे 8 वीं तो पास कर दिए जाएँगे परंतु 9 वीं कक्षा में शर्तिया फेल हो जाएँगे। वहीं इस बारे में कुछ शिक्षाविद और शिक्षक मानते हैं कि निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत सभी को कम से कम 8 वीं कक्षा तक की अनिवार्य शिक्षा दिलवाने के हिसाब से यह उचित प्रयास है।
राज्य में ग्रेडिँग पद्धति अभी शुरू नहीं हुई है। ऐसे में एक शिक्षक ने मुझसे सवाल किया कि उदाहरण के लिए एक ऐसा कोई विद्यार्थी है जिसके केवल 19 प्रतिशत अंक ही प्राप्त हुए हैं उसे पास करने के लिए क्या उसके 17 प्रतिशत अंक उत्तर पुस्तकों में बढ़ाए जाएँगे? यदि उसके अंक बढ़ा दिए जाएँगे तो गलत को सही मानना तो सरासर भ्रष्टाचार की श्रेणी में आएगा।
इस बारे में मेरा मन भी दुविधा में पड़ गया।
एक अन्य शिक्षक ने कहा कि जब कानून है तो यह भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आएगा। वैसे अंकों को इस तरह बढ़ाने की बजाए जितने अंक आ रहे रहे हैं उसी के अनुरूप उस बालक को ग्रेड दे दी जानी चाहिए।
इस बारे में मेरे मन में कई प्रश्न उठते हैं और ऐसे प्रश्न कई लोगों द्वारा उठाए जा रहे हैं कि यदि पास ही किया जाना था तो परीक्षा का ढकोसला ही क्यूँ किया जाए? शिक्षा और परीक्षा की हम पद्धति ही ऐसी क्यों न बना दें कि बच्चा वास्तव में कभी फैल हो ही नहीं? क्या शिक्षा के अधिकार अधिनियम में यह प्रावधान है कि बच्चे को फैल नहीं किया जाए या यह प्रावधान है कि हम उसे ऐसा पढ़ाएं कि वह फैल हो ही नहीं पाएँ?
इस प्रकार पास करते रहने के कारण वह बच्चा कमजोर रहा तथा आगे 9 वीं / 10 वीं में फैल होता रहे तब क्या उसका यह अधिकार नहीं होगा कि इस व्यवस्था से पूछे कि मुझे क्यों पास कर दिया गया? क्या वास्तव में फैल होते हुए भी पास होना बच्चे का अधिकार है? यदि हाँ तो फैल होना भी उसका अधिकार होना चाहिए, उसे ही तय करने देना चाहिए कि वह पास हो अथवा फैल।
क्या एक बच्चा जो वास्तव में वांछित स्तर को प्राप्त नहीं कर पाया उसे वांछित स्तर प्राप्ति का झूठा प्रमाण पत्र देना किसी कानून या नैतिकता की दृष्टि से उचित है? क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था का दायित्व यह नहीं बनता कि झूठे प्रमाण पत्र देने की बजाए ऐसा कुछ प्रयास करें कि वह बालक अपना वांछित स्तर प्राप्त कर लें? क्या ऐसे बालकों के लिए एक या दो माह के विशेष शिविर नहीं लगा दे ताकि वह कक्षा 9 वीं में पहुँचने की योग्यता हासिल कर ले और उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं हो?
कई बार यह प्रश्न भी शिक्षक उठाते हैं कि 5 वीं कक्षा में इस प्रकार पास करने के कारण जो कमजोरी रही है वो कमजोरी आगे की कक्षाओं में भी बनी रही और कहीं कहीं तो स्थिति तो यहाँ तक है कि आठवीं का बच्चा पुस्तक पढ़ ही नहीं पाता और कागज पर कुछ भी सही लिख भी नहीं पाता, क्या फैल नहीं करने की ऐसी व्यवस्था उचित है? हमारी मौजूदा व्यवस्था में पूरी तरह संशोधन किए बिना फिर ऐसी व्यवस्था लगाना अनुचित है और बच्चों के भविष्य के साथ खेलना है?
साथियों ये सब विचारणीय प्रश्न हैं। आइए हम सब मंथन करें।

No comments:

Post a Comment