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Wednesday, April 20, 2011

कवि गिर्दा की एक कविता

कवि गिर्दा की एक कविता है- "कैसा हो स्कूल हमारा?"
यह कविता मुझे अच्छी लगी। आपसे भी शेयर कर रहा हूँ।

कैसा हो स्कूल हमारा?
जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा।
जहाँ न पटरी माथा फोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा।
जहाँ न अक्षर कान उखाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा।
जहाँ न भाषा जख़्म उघाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा।
कैसा हो स्कूल हमारा ?

यशपाल समिति की रिपोर्ट "शिक्षा बिना बोझ के" तथा राष्ट्रीय पाठ्य चर्या की रूपरेखा 2005 के मूलभूत सिद्धांतों से मेल खाती हुई यह कविता प्रत्येक स्कूल की दीवारों पर टंगी होनी चाहिए और शिक्षकों को लगातार इससे प्रेरणा लेकर अपने शिक्षण की व्यूह रचना में परिवर्तन करना चाहिए। शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भी इसकी भावना से अवगत करा कर शिक्षकों को इस और प्रेरित करना चाहिए कि वे बच्चों के मनस से शिक्षा के बोझ को कम करने के लिए प्रयास करें।

1 comment:

  1. वाकई ये पंक्तिया हमारी शिक्षा व्यवस्था पर गहरी चोट करती है | प्रकाश जी आप ने जिनकी कविता यहाँ पर लिखी हे उनका संक्षिप्त परिचय दे रहा हूँ | जनकवि गिरीश तिवारी "गिर्दा" का जन्म १० सितम्बर १९४२ ज्योली गाँव जिला अल्मोड़ा में हुआ था |गिर्दा लोकप्रिय कवि,गीतकार और नाटककार थे |आपने कई नाटको का निर्देशन भी किया था | इसके साथ हे गिर्दा जमीन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता थे | २० अगस्त २०१० को को गिर्दा हमेशा हमेशा के लिए इस दुनिया को को छोड़ गए |गिर्दा अपनी कविता गीतों और नाटको के माध्यम से हमें हमेशा याद आते रहेंगे |

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