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Monday, April 4, 2011

महँगी होती पढ़ाई है चिंता का विषय

अभी राजस्थान पत्रिका में एक भारी चिंता में डालने व चौंका देने वाली खबर आई कि बच्चों की पढ़ाई पर महानगरों के माता-पिता अपनी कमाई का 40 फीसदी हिस्सा खर्च कर रहे हैं। एसोसिएटेड चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (एसोचैम) ने हाल में शिक्षा पर होते खर्च को लेकर 2,000 अभिभावकों पर एक सर्वे किया। सर्वे का विषय, "शिक्षा पर बढ़ती लागत से परेशान अभिभावक" था। दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ, देहरादून, पुणे, बेंगलुरू, कोलकाता, चेन्नई और चंडीगढ़ में हुए इस सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार 2011 में सिर्फ एक बच्चे की प्राथमिक/ माध्यमिक शिक्षा पर अभिभावकों का खर्च करीब 94,000 रूपए तक हो जाएगा। यह खर्च फीस, स्कूल आना-जाना, किताबें, पोशाक, स्टेशनरी, किताबें, टूर व पढ़ाई से जुड़ी अन्य चीजों आदि पर होगा। सर्वेक्षण के निष्कर्ष हैं कि शिक्षा की बढ़ती लागत अभिभावकों के लिए चिंता का एक प्रमुख कारण बन गया है। इस सर्वे से यह भी निष्कर्ष प्राप्त हुआ है कि स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने तक एक बच्चे पर अभिभावक के 18-20 लाख रुपए खर्च हो जाते हैं। अहमदाबाद में करीब 65 फीसदी अभिभावक ऐसे हैं जिनकी आय का 50 फीसदी बच्चों की शिक्षा पर ही खर्च होता है।

56 प्रतिशत अभिभावकों का यह भी कहना था कि उन्हें बच्चों के भविष्य की चिंता है और महंगी शिक्षा के कारण उन्हें बच्चों को एक्स्ट्रा-करिकुलर एक्टिविटीज से वंचित करने को बाध्य होना पड़ रहा है। एसोचैम के महासचिव डी.एस. रावत के मुताबिक शिक्षा पर खर्च हर साल बढ़ता जा रहा है और यह अभिभावकों की परेशानी का सबब है।

मित्रों ऐसा केवल महानगरों तक ही सीमित नहीं है। राजस्थान के छोटे शहरों में भी एक बच्चे की पढ़ाई पर कई अभिभावकों की पचास हजार से एक लाख रुपए तक खर्च हो रहा है। इसमें से स्कूल की ट्यूशन फीस तो नाम मात्र की है, बाकी सारा खर्च तो ना जाने किस बात पर होता है यह एक प्रश्न है। दोस्तों ये कौनसी चूहा दौड़ है जो अभिभावकों की गाढी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा शिक्षा के नाम पर हड़प लिया जा रहा है। इस मुद्दे को प्रमोद जी ने यहाँ पहले भी उठाया था कि शिक्षा के निजीकरण पर अंकुश क्यों नहीं लगता और वास्तविक सीखने की बजाए थोथी प्रतियोगिता की और बच्चों को क्यूँ धकेला जा रहा है?

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