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Saturday, March 20, 2010

प्रतिभा खोज परीक्षा

अभी हाल ही में राजस्थान में प्रतिभा खोज परीक्षा के परिणाम पर विवाद खड़ा हो गया । विवाद क्या था ? इस के बारे में मैं इतना ही जान पाया की कुछ अभिभवको का कहना हे की हमारे बच्चोका नंबर नहीं लगा। ये बात सही हो सकती हैं मैं अपने आप को इस विवाद से अलग करता हूँ । पर ये विवाद मेरे मन में टीस छोड़ गया । कई प्रश्न मेरे मस्तिस्क में खदबदा रहे हैं । अपनी इन्ही शंकाओ को लेकर आप सब सम्मुख हूँ ।
मेरी पहली शंका यह हे की क्या मात्र प्रतिभा खोज परीक्षा मैं बेठने वाले विद्यार्थी ही प्रतिभावान हैं?यदि नहीं थो क्या विसम परिस्तिथ्यो वाले हमारे राजस्थान के दूर दराज में रहने वाले उन विद्यार्थियो के साथ ये अन्याय नहीं हैं । चलो मान लिया जाय की परीक्षा की घोषणाऔर प्रयाप्त विज्ञापन किया जाता हैं इस लिए प्रतिभावानको परीक्षा देनी चाहिए । राजस्थान के दूर दराज में रहने वाले विद्यार्थियो और जयपुर, कोटा में कोचिंग लेकर परीक्षा देने वाले विद्यार्थियो में क्या कोई अंतर नहीं हैं । ये तो वाही बात हो गई की ४० किलो के पहलवान को ८० किलो के पहलवान से टक्कर करवाई जाए ।
मेरी दूसरी शंका ये हे की कोचिंगो क माया जाल में फंसी इस परीक्षा के माध्यम से सही प्रतिभा का चयन होता हैं? मिडल लेवल पर ली जाने वाली ये परीक्षा कितनी उचित हैं ? क्या परीक्षा उन के नन्हे मस्तिस्क पर अनावश्यक बोझ नहीं हैं ? क्या हम और अभिभावक मिल कर इन नन्हो को अंधी चुआ दोड में धकेल रहे हैं ?हम हमरे बच्चो पर अपनी मतावाकक्षा का बोझ दाल देते हैं । इस पूरी प्रेक्टिस से हम हमारे बच्चो की नेर्सेगिक प्रतिभा को कुंद करते हैं। हम हमारे बच्चो को तनाव और हताशा की अंधी गलियो छोड़ कर खुद की प्रसिधी की भूख को बच्चो को मिलने वाली तालियो से मिटाना चाहते हैं ।
एक प्रश्न ये भी हे की यदि इस में स्कोलरशिप नहीं मिलतीं तो भी क्या हम इतने सक्रिया रह कर परीक्षा दिलवाते । प्रश्न ये भी हैं की जब सारा शक्षिक चिंतन परीक्षा और तनावों से मुक्ति क लिया nई व्यवस्था की तलाश कर रहा हे तो इस परीक्षा का ओचित्य ही क्या हैं ? जब मानसिक योग्यता और शेक्षिक उप्लाभ्धि में अभ्यास से अभिव्र्धि की जा सकती हैं तो फिर इस परीक्षा से तो मात्र अभ्यास का ही मापन हुआ । फिर मात्र एक दिन की परीक्षा से प्रतिभा साली का तमगा देना कितना उचित हैं ?
मेरी नज़र में इस क ली एक सतत मूल्याङ्कन प्रकिरिया अपने जनि चैये जिस में केवल शक्षिक उपलब्धि ही आधार नहीं हो । विद्यार्थी की रूचि क अनुसार उसकी प्रतिभा का आंकलन होना चाहिए । तभी हम न्याय कर पाएँगे।
इस समस्या का हल यदि कोई खोज सकता हैं तो वो सृजन शील शिक्षक ही हैं । मेरा आप सभी से विनम्र अनुरोध हैं की इस घभीर मसले पर अपने आप को मुखर कर अपने विचारो से मुझे आवगत करवाएं। मेरा विस्वास हे की राजस्थान क सृजनशील शिक्षक साथी इस समस्या पर जरुर विचारविमर्श कर कोई सर्व मान्य खोज निकालेंगे।

3 comments:

  1. Pramod ji apke vichar ekdam satik hi.Aaj pratibha ka sahi mulyankan ho hi nahi raha hi.Tamam pratibhayen khilne se pahle hi murjha jati hi.Hame un kaliyon ko khilane ka sarthak prayas karna hoga jinke pas adhunik suvidhaon ka abhav hi.Kintu yogyata ki kami nahi hi.
    wish U all d Best.

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  2. प्रिय प्रमोद जी
    सप्रेम नमस्ते!
    मैं आपके विचारों से शत प्रतिशत सहमत हूं.मुझे विनोददास की ‘वर्णमाला से बाहर’कविता की ये पंक्तियां याद आ रहीं हैं;
    बच्चा/रेसकोर्स का एक अनपरखा अश्व है/उस पर दांव लगा रखा है/माता-पिता ने अपनी आकांक्षाओं का भविष्य/कोई रियायत नहीं/झूलने-खेलने का अवकाश भी नहीं/उसे ठोंक पीट कर बनाया जा रहा है/वर्ण्माला का बंद अक्षर/जब वह बड़ा होगा/अपने शत्रु को भी विनम्रता से/ हाथ जोड़कर करेगा ‘नम्स्कार’/सर्कस के शेर की तरह.
    आपका
    माधव नागदा

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  3. प्रिय प्रमोद जी
    सप्रेम नमस्ते!
    मैं आपके विचारों से शत प्रतिशत सहमत हूं.मुझे विनोददास की ‘वर्णमाला से बाहर’कविता की ये पंक्तियां याद आ रहीं हैं;
    बच्चा/रेसकोर्स का एक अनपरखा अश्व है/उस पर दांव लगा रखा है/माता-पिता ने अपनी आकांक्षाओं का भविष्य/कोई रियायत नहीं/झूलने-खेलने का अवकाश भी नहीं/उसे ठोंक पीट कर बनाया जा रहा है/वर्णमाला का बंद अक्षर/जब वह बड़ा होगा/अपने शत्रु को भी विनम्रता से/ हाथ जोड़कर करेगा ‘नमस्कार’/ सर्कस के शेर की तरह.
    आपका
    माधव नागदा
    (पूर्व की पोस्ट में दो शब्द गलत प्रिन्ट हो गये हैं)

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