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Wednesday, January 27, 2010

चिंता और चिंतन

मित्रो आज फिर आप से मुखातिब हूँ । अपनी कुछ चिन्ताओ के साथअभी कुछ दिनों पहले आप लोगो ने समाच्रो में पढ़ा होगा की बहुत से बच्चो ने मुंबई में आत्म हत्या कर ली। इस घटना ने मुझे बहुत विचलित किया । और मैं समझता हूँ की आप लोग भी विचलित हुए होंगे । ऐसी घटनाए हम सृजनशील शिक्षको को बहुत परेशां करती हैं। आज हमने हर बात के myene आर्थिक कर लिए हैं की हुम आपने बच्चो को इन्सान नहीं समझते अपितु उन को वस्तू समझते हैं । हम अपनी हताशा उन पर थोपते हैं । जो सपने हमने आपने लिए चुने थे जिन सपनो को हम अपनी पूरी ताकत लगा कर भी पूरा नहीं कर पाए थे उन को पूरा करने की मशीन के रूप में बच्चो का उपयोग करते हैं । परिणाम हमरे बच्चे दबाब में आ जाते हैं । उन के अबोध मन पर हम आपनी आकांक्षा का इतना बोझ डाल देते है की वो काररीएर को hi जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लेते हैं । ये दबाब उन को कभी कभी इतना तोड़ देता हैं। वे इस mahol से आतंकित हो जाते हैं जीवन उन को तुच्छ लगने लगता हैं । हम शिक्षको का ये कर्तव्य बनता है की अपने विद्यार्थियो को जीवन में संघर्ष करने की क्षमता paida करे । उन को मात्र सफलता का पाठ hi नहीं पदाए अपितु उन्हें असफल होने पर तनाव से लड़ने का पाठ पदाए। हम abhibahavko की भी counsling करे । हम आपने विद्यार्थियो जीवन की kadvi sachchaio से भी avgat karvae। jjan हैं tho jahan है इस बात को बच्चो को bhli bhanti samjhae।

1 comment:

  1. pramid ji
    aap ka blog aacha lag raha he sahi hain ki hum apni akakshao ka bojh bacho par daltae hain

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